विनोद कांबली ‘अर्श से फर्श’ तक की कहानी
पूर्व भारतीय क्रिकेटर विनोद कांबली की जिंदगी ‘अर्श से फर्श’ तक के सफर की एक बेहद भावुक और आंखें खोलने वाली कहानी है,
स्कूली दिनों में सचिन तेंदुलकर के साथ मिलकर 664 रनों की ऐतिहासिक रिकॉर्ड साझेदारी करने वाले विनोद कांबली को एक समय सचिन से भी ज्यादा टैलेंटेड खिलाड़ी माना जाता था। उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम में आते ही तहलका मचा दिया और अपने शुरुआती 7 टेस्ट मैचों में ही 2 दोहरे शतक और 2 शतक ठोक दिए थे।
उनका टेस्ट बल्लेबाजी औसत (54.20) महान सचिन तेंदुलकर (53.78) से भी बेहतर रहा। 90 के दशक में कांबली का स्टाइल, उनकी सोने की चेन, महंगी गाड़ियां और खेलने का अंदाज युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय था, जिसने उन्हें रातों-रात अथाह पैसा और शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया।
लेकिन अचानक मिली इस बेहिसाब कामयाबी और स्टार्डम को कांबली संभाल नहीं पाए। अनुशासन की कमी, लेट-नाइट पार्टियों और शराब की लत ने धीरे-धीरे उनके खेल पर असर डालना शुरू कर दिया। साल 1996 के वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में ईडन गार्डन्स पर श्रीलंका के खिलाफ मैच के दौरान जब दर्शकों के हुड़दंग के कारण मैच रोकना पड़ा, तो विनोद कांबली मैदान से रोते हुए बाहर निकले। वह उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था, जिसके बाद उनका करियर कभी पटरी पर नहीं लौट सका और महज 28 साल की उम्र में उन्होंने अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेला।
करियर खत्म होने के बाद कांबली कंगाली और बदहाली के जाल में फंस गए। उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें बीसीसीआई से मिलने वाली ₹30,000 की मासिक पेंशन और सुनील गावस्कर के ‘चैम्प्स फाउंडेशन’ से मिलने वाली मदद के सहारे गुजारा करना पड़ रहा था। गलत आदतों और आर्थिक तंगी ने न सिर्फ उनका पैसा बर्बाद किया, बल्कि उनके पारिवारिक जीवन में भी कई बड़े विवाद खड़े किए।
आज की तारीख में उनकी स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक हो चुकी है। हाल ही में वह ठाणे के ‘निदान एल्डरली केयर सेंटर’ (वृद्धाश्रम) में दिन काटते नजर आए। गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जूझ रहे कांबली के दिमाग में ‘ब्लड क्लॉट’ होने की वजह से उनकी याददाश्त कमजोर हो रही है, उन्हें चलने-फिरने में भारी दिक्कत होती है और उन पर हमेशा स्ट्रोक का खतरा मंडराता रहता है।
यह पूरी कहानी आपके पोर्टल के पाठकों के लिए एक बड़ा सबक है कि सफलता हासिल करना जितना मुश्किल है, उसे संभाल कर रखना उससे भी कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। जहाँ सचिन तेंदुलकर ने अनुशासन के दम पर खुद को ‘क्रिकेट का भगवान’ बना लिया, वहीं विनोद कांबली अनुशासनहीनता के कारण इतिहास के पन्नों में एक ‘अधूरी दास्तान’ बनकर रह गए।

