पहाड़ों की रानी ‘मसूरी’ के वो 8 अनसुने राज, जिनसे आज भी अनजान हैं कई पर्यटक!
1. झाड़ी ‘मंसूर’ से पड़ा नाम, अंग्रेज नहीं कर पाए थे सही उच्चारण
शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि मसूरी का नाम किसी राजा या ऐतिहासिक घटना पर नहीं, बल्कि एक पौधे पर पड़ा है. प्राचीन समय में यहाँ ‘मंसूर’ नाम की एक झाड़ी (Shrub) बहुत बड़ी मात्रा में उगती थी. स्थानीय लोग इसे ‘मंसूरी’ ही कहते थे. जब ब्रिटिश अधिकारी यहाँ आए, तो वे ‘मंसूरी’ शब्द का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और उनके मुंह से ‘मसूरी’ निकलने लगा, जिसके बाद इसका आधिकारिक नाम मसूरी हो गया.
2. ब्रिटिश कैप्टन को शिकार के दौरान पसंद आई थी यह जगह
साल 1823 से पहले मसूरी एक अनजान और पूरी तरह से निर्जन पहाड़ हुआ करता था. इसकी खोज का श्रेय एक ब्रिटिश मिलिट्री अफसर कैप्टन यंग और प्रशासनिक अफसर एफ.जे. शोर को जाता है. वे यहाँ शिकार और पर्वतारोहण के लिए आए थे. यहाँ की खूबसूरती और ठंडी जलवायु से प्रभावित होकर उन्होंने यहाँ रहने का फैसला किया, जिससे आगे चलकर यह एक मशहूर हिल स्टेशन बना.
3. ‘मॉल रोड’ पर भारतीयों के आने पर लगी थी पाबंदी!
औपनिवेशिक काल (British Era) के दौरान मसूरी के प्रसिद्ध मॉल रोड पर अंग्रेजों का पूरी तरह से दबदबा था. उस समय मॉल रोड के एंट्री गेट पर एक नस्लवादी बोर्ड लगा होता था, जिस पर लिखा था: “Indians and Dogs Not Allowed” (भारतीयों और कुत्तों का आना मना है). हालांकि, नेहरू जी के पिता पंडित मोतीलाल नेहरू जब भी मसूरी आते, तो वे जानबूझकर इस नियम को तोड़ते थे और अंग्रेजों को जुर्माना भरते थे.
4. भारत का पहला ‘बीयर पब’ यहीं खुला था
इतिहास के शौकीनों के लिए यह एक बेहतरीन फैक्ट है. भारत की सबसे पहली मद्यशाला या बीयर ब्रूअरी (Brewery) साल 1830 में कैप्टन यंग द्वारा मसूरी के पास ‘लैंडौर’ (Landour) में स्थापित की गई थी, जिसे ‘द ओल्ड ब्रूअरी’ के नाम से जाना जाता था. यहाँ की बनी बीयर उस समय पूरे देश में ब्रिटिश सैनिकों को भेजी जाती थी.
5. जॉर्ज एवरेस्ट: जिनके नाम पर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है, उनका घर यहाँ है
दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी ‘माउंट एवरेस्ट’ का नाम जिनके नाम पर रखा गया है, वे सर जॉर्ज एवरेस्ट (भारत के सर्वेयर जनरल) साल 1832 से 1843 तक मसूरी में ही रहे थे. मसूरी में आज भी उनका ऐतिहासिक घर और लैबोरेट्री मौजूद है, जिसे ‘जॉर्ज एवरेस्ट हाउस’ कहा जाता है. यहीं बैठकर उन्होंने भारत के कई महत्वपूर्ण नक्शे तैयार किए थे.
6. दलाई लामा का भारत में पहला आशियाना
जब साल 1959 में तिब्बती आध्यात्मिक गुरु 14वें दलाई लामा तिब्बत से पलायन कर भारत आए थे, तो उन्होंने सबसे पहले मसूरी को ही अपना घर बनाया था. वे यहाँ के ‘हैप्पी वैली’ (Happy Valley) इलाके में रुके थे, जिसके बाद भारत सरकार ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला (मैक्लोडगंज) में स्थायी रूप से बसाया. आज भी हैप्पी वैली में तिब्बती संस्कृति की गहरी झलक मिलती है.
7. जब गन हिल से ‘तोप दागकर’ बताया जाता था समय
मसूरी की दूसरी सबसे ऊंची चोटी ‘गन हिल’ (Gun Hill) का नाम बहुत दिलचस्प है. आजादी से पहले, ब्रिटिश काल में इस पहाड़ी के ऊपर एक तोप रखी गई थी. हर दिन दोपहर के ठीक 12 बजे इस तोप से गोला दागा जाता था, ताकि स्थानीय लोग धमाके की आवाज सुनकर अपनी घड़ियों का समय मिला सकें. आज तोप तो नहीं है, लेकिन यह नाम इतिहास का गवाह बनकर अमर हो गया है.
8. मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड का ‘सदाबहार’ ठिकाना
साहित्य प्रेमियों के लिए मसूरी का लैंडौर इलाका किसी मक्के से कम नहीं है. पद्म भूषण से सम्मानित भारत के सबसे चहेते लेखक रस्किन बॉन्ड (Ruskin Bond) पिछले कई दशकों से मसूरी की वादियों में रहकर अपनी कहानियाँ लिख रहे हैं. बॉलीवुड के कई सितारे और बड़े कलाकार भी अक्सर अपनी फिल्मों की शूटिंग के लिए यहाँ आते रहते हैं.


Nice
thanku bhai