मौलाराम और क्या है श्रीनगर के ‘मौलाराम संग्रहालय’ का इतिहास?
उत्तराखंड की धरोहर: जानें कौन थे महाकवि मौलाराम और क्या है श्रीनगर के ‘मौलाराम संग्रहालय’ का इतिहास?
श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की पावन भूमि सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत के लिए भी दुनिया भर में जानी जाती है। इसी गौरवशाली इतिहास का एक चमकता हुआ सितारा हैं—महाकवि और विलक्षण चित्रकार मौलाराम तोमर। गढ़वाल की प्राचीन राजधानी श्रीनगर में स्थित ‘मौलाराम चित्र संग्रहालय’ (HNB गढ़वाल विश्वविद्यालय संग्रहालय) आज भी उनकी कालजयी कलाकृतियों और इतिहास को खुद में समेटे हुए है।
आखिर कौन थे मौलाराम? (Who was Mola Ram?)
मौलाराम तोमर (1743–1833) भारतीय इतिहास के एक ऐसे अनूठे कलाकार थे, जो एक ही समय में प्रसिद्ध चित्रकार, महाकवि, इतिहासकार और कूटनीतिज्ञ (Diplomat) की भूमिका निभा रहे थे। वे गढ़वाल के राजाओं के दरबार में शाही कलाकार थे।
- मुगल दरबार से जुड़ाव: सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में जब मुगल शहजादे सुलेमान शिकोह (दारा शिकोह के पुत्र) ने औरंगजेब के डर से गढ़वाल के राजा पृथ्वीपति शाह के यहाँ शरण ली थी, तब उनके साथ उनके दरबारी चित्रकार श्यामदास और हरदास भी गढ़वाल आए थे। सुलेमान शिकोह तो चले गए, लेकिन ये चित्रकार यहीं बस गए। इसी वंश की चौथी पीढ़ी में वर्ष 1743 में मौलाराम का जन्म हुआ।
- गढ़वाल स्कूल ऑफ पेंटिंग की स्थापना: मौलाराम ने मुगल चित्रकला की बारीकियों को पहाड़ी परिवेश और संस्कृति के साथ मिलाकर एक नई विधा को जन्म दिया, जिसे ‘गढ़वाल स्कूल ऑफ मिनिएचर पेंटिंग’ (Garhwal School of Miniature Painting) कहा जाता है। [1, 2]
- बहुमुखी प्रतिभा के धनी: मौलाराम केवल ब्रश से चित्र ही नहीं उकेरते थे, बल्कि वे हिंदी, फारसी, ब्रजभाषा और संस्कृत के भी प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने गढ़वाल राजवंश पर प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ ‘गढ़राजवंश का इतिहास’ और ‘गणिका नाटक’ जैसी कई साहित्यिक रचनाएं लिखीं।
- कठिन अंतिम दिन: उन्होंने गढ़वाल के राजाओं, गोरखा शासन और शुरुआती ब्रिटिश काल के उतार-चढ़ाव को अपनी आँखों से देखा। इतिहास बताता है कि गोरखा और ब्रिटिश शासन के दौरान उनकी जागीर छीन ली गई, जिसके कारण उनके अंतिम दिन बेहद मुफ़लिसी (गरीबी) में गुजरे।

मौलाराम चित्र संग्रहालय (Mola Ram Museum)
श्रीनगर गढ़वाल स्थित संग्रहालय में मौलाराम और उनके वंशजों (जैसे ज्वाला राम, तेज राम) द्वारा बनाई गई अद्भुत कृतियों को संरक्षित किया गया है।
- क्या है खास? यहाँ उनके द्वारा बनाए गए प्रसिद्ध मिनिएचर (लघु) चित्र, रेखाचित्र और पांडुलिपियां रखी गई हैं। उनके चित्रों में मुख्य रूप से हिंदू पौराणिक कथाएं (जैसे रामायण, गीता गोविंद), सुंदर दृश्यावलियां और दरबारी जीवन की झलकियां देखने को मिलती हैं।
- दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं पेंटिंग्स: आपको जानकर हैरानी होगी कि मौलाराम की कला सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। वर्ष 1968 में प्रसिद्ध लेखक बैरिस्टर मुकंदीलाल ने अपनी किताब ‘गढ़वाल पेंटिंग्स’ के जरिए मौलाराम की कला को वैश्विक स्तर पर पुनर्जीवित किया। आज मौलाराम के चित्र श्रीनगर संग्रहालय के अलावा बोस्टन म्यूजियम (अमेरिका), भारत कला भवन (बनारस) और दिल्ली, कोलकाता, अहमदाबाद के बड़े कला संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
कला प्रेमियों के लिए एक तीर्थ
यदि आप इतिहास, कविता और चित्रकारी के शौकीन हैं, तो श्रीनगर गढ़वाल का यह संग्रहालय आपके लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह स्थान हमें याद दिलाता है कि पहाड़ों की कंदराओं में किस कदर विश्वस्तरीय कला का जन्म हुआ था। सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा इस धरोहर को और अधिक सहेजने तथा प्रचारित करने की लगातार मांग उठती रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान पहाड़ी कलाकार के योगदान से रूबरू हो सकें।
