पुतला जलता है रावण नहीं
Ravan Dahan, according to Hindu culture, Effigies of Ravana are burned on Vijayadashami, in India at many places, Ravana burning in dussehra festival, crowd or people taking picture with smartphone
दशहरे के रावण और हमारे समाज का सच: प्रतीक जल रहा है, पर बुराई का क्या?
हर साल विजयादशमी आती है, ढोल-नगाड़ों की गूंज होती है, रंग-बिरंगे आतिशबाजी के बीच कागज और बांस से बने रावण का विशाल पुतला धू-धू कर जल उठता है। भीड़ तालियां बजाती है, “अधर्म पर धर्म की विजय” के नारे लगते हैं, और लोग इस संतोष के साथ घर लौट आते हैं कि इस साल भी बुराई का अंत हो गया। लेकिन जब हम अगली सुबह का अखबार उठाते हैं या टीवी की खबरें देखते हैं, तो एक कड़वा सवाल सीना छलनी कर देता है—अगर रावण कल रात जल चुका है, तो हमारे बीच फैली यह असीम बुराई जीवित कैसे है?
यदि त्रेतायुग के रावण को देखें, तो उसने एक महापाप किया था—माता सीता का हरण। लेकिन उसी रावण के पास ज्ञान, वेदों का बोध और महाकाल की भक्ति भी थी। उसने सीता का अपहरण किया, पर अपनी सीमाओं और मर्यादा का हनन करने से पहले विचार भी किया। लेकिन आज के समाज में जो ‘अदृश्य रावण’ घूम रहे हैं, उनके पास न तो कोई मर्यादा है और न ही कोई नैतिक सीमा।
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हमारे चारों ओर पनपता आधुनिक रावण
आज हम जिस समाज में सांस ले रहे हैं, वहां बुराई केवल एक पुतले तक सीमित नहीं है:
* अपराध और बलात्कार: हर रोज़ मासूमों की चीखें समाज के खोखलेपन को उजागर करती हैं। जिस देश में नारी को देवी का दर्जा दिया जाता है, वहीं उसके साथ होने वाले जघन्य अपराध और दुष्कर्म (रेप) इंसानी संवेदनाओं को शर्मसार कर रहे हैं।
* घोटाले और धांधली: वित्तीय घोटाले, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक धांधली ने आम आदमी के हक पर डाका डाला है। हर योजना, हर व्यवस्था में लालच और भ्रष्टाचार का रावण बैठा हुआ है।
* संबंधों का पतन: समाज की नींव माने जाने वाले रिश्तों में छल, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स (वैवाहिक बेवफाई) और धोखा इस कदर बढ़ गया है कि अब भरोसे शब्द के मायने ही बदल गए हैं।
* हिंसा और खून-खराबा: मामूली बातों पर अपनों का ही खून बहा देना, हिंसा और नफरत फैलाना आज का नया सामान्य बनता जा रहा है।
सांकेतिक उत्सव या नैतिक ढोंग?
हम हर साल 100 फीट ऊंचा रावण जलाकर खुद को दिलासा देते हैं कि हमने बुराई को नष्ट कर दिया। लेकिन सच्चाई यह है कि यह केवल एक सांकेतिक रस्म बनकर रह गई है। पुतला जलाना बहुत आसान है, क्योंकि उसमें न कोई त्याग लगता है और न ही आत्म-मंथन।
वास्तविक चुनौती तो अपने भीतर छिपे ‘रावण’—हमारे अपने लालच, वासना, अहंकार, भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ चुप रहने की आदत को जलाने की है। जब तक हम अपने चरित्र की बुराइयों, रिश्तों के प्रति बेवफाई और समाज के प्रति अपनी जवाबदेही को नहीं सुधारते, तब तक रावण का दहन केवल एक तमाशा और मनोरंजन का जरिया ही बना रहेगा।
निष्कर्ष: पुतले नहीं, मानसिकता जलाएं
यदि दशहरे के पर्व को सच में सार्थक बनाना है, तो हमें उत्सव की परिभाषा बदलनी होगी।
* रावण को जलाते समय केवल तालियां न बजाएं, बल्कि संकल्प लें कि हम किसी अन्याय के खिलाफ चुप नहीं रहेंगे।
* नारी के सम्मान की रक्षा केवल नारों में नहीं, अपने आचरण में करेंगे।
* भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी को बढ़ावा देने के बजाय ईमानदारी को अपनी ताकत बनाएंगे।
जिस दिन समाज से बलात्कार की मानसिकता, रिश्तों का छल, भ्रष्टाचार की धांधली और खून-खराबा कम होने लगेगा, उसी दिन सच्चा विजयदशमी पर्व मनाया जाएगा। जब तक भीतर की बुराइयां जिंदा हैं, बाहर के रावण को जलाने का कोई औचित्य नहीं है।
आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? क्या आपको लगता है कि हमारे सामाजिक त्योहारों को अब केवल रस्मों के बजाय आत्म-सुधार का माध्यम बनाना चाहिए?

