1000 साल पुराना इतिहास: कुमाऊं के वीरों की दास्तान
उत्तराखंड का गौरवशाली इतिहास: जानिए कुमाऊं के ‘चंद राजवंश’ की शौर्य गाथा और ऐतिहासिक विरासत
देहरादून/अल्मोड़ा। उत्तराखंड की देवभूमि न केवल आध्यात्मिक रूप से समृद्ध है, बल्कि इसका ऐतिहासिक अतीत भी बेहद गौरवशाली रहा है। कुमाऊं मंडल के इतिहास की बात करें तो ‘चंद राजवंश’ (Chand Dynasty) का नाम सबसे ऊपर आता है। करीब एक हजार साल पहले शुरू हुए इस राजवंश ने कुमाऊं को एक नई पहचान दी और कला, संस्कृति व वास्तुकला की ऐसी अमूल्य धरोहरें सौंपीं, जो आज भी जीवंत हैं।
आइए जानते हैं कैसे चंपावत के ‘राजबुंगा किले’ से शुरू हुआ यह साम्राज्य अल्मोड़ा की पहाड़ियों तक फैला और इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। 
सोमचंद ने रखी थी साम्राज्य की नींव (Founding of the Dynasty)
इतिहासकारों और लोक-कथाओं के अनुसार, चंद वंश की स्थापना राजा सोमचंद ने की थी। माना जाता है कि वह 10वीं-11वीं शताब्दी के आसपास प्रयागराज (झूंसी) से बद्रीनाथ यात्रा पर आए थे। उनकी योग्यता से प्रभावित होकर तत्कालीन कत्यूरी राजा ब्रह्मदेव ने अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया और दहेज में चंपावत की जागीर दी। सोमचंद ने चंपावत में ‘राजबुंगा किले’ का निर्माण कर चंद राजवंश की स्थापना की 

चंपावत से अल्मोड़ा: जब बदली कुमाऊं की तकदीर
शुरुआत में चंद राजाओं का शासन केवल काली कुमाऊं (चंपावत) तक सीमित था। लेकिन 16वीं शताब्दी में राजा बालो कल्याण चंद ने साम्राज्य का विस्तार किया और 1563 ईस्वी में अपनी राजधानी को चंपावत से स्थानांतरित कर अल्मोड़ा (खगमरा कोट के पास) स्थापित किया। इसके बाद अल्मोड़ा कुमाऊं की राजनीति और संस्कृति का मुख्य केंद्र बन गया।
चंद वंश के महाप्रतापी राजा और उनके बड़े कार्य
चंद राजवंश में कई ऐसे पराक्रमी राजा हुए, जिन्होंने मुगलों से लोहा लिया तो दूसरी तरफ नेपाल के मल्ल राजाओं को धूल चटाई:
- भारती चंद (Bharati Chand): इन्होंने नेपाल (डोटी) के राजाओं की अधीनता को स्वीकार करने से मना किया और 12 वर्षों तक लंबा संघर्ष कर कुमाऊं को स्वतंत्र कराया।
- गरुड़ ज्ञान चंद (Gyan Chand): दिल्ली सल्तनत के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के दरबार में जाने वाले ये पहले चंद शासक थे, जहां इन्हें ‘गरुड़’ की उपाधि मिली थी।
- रुद्र चंद (Rudra Chand): अकबर के समकालीन राजा रुद्र चंद ने तराई क्षेत्र में रुद्रपुर शहर की स्थापना की थी।
- बाज़ बहादुर चंद (Baz Bahadur Chand): इन्होंने तिब्बत के हूणिया शासकों को हराया और कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग को लुटेरों से मुक्त कर तीर्थयात्रियों के लिए सुरक्षित बनाया।
प्रशासन, अपनी मुद्रा और टैक्स प्रणाली (Sirti System)
चंद शासकों का प्रशासनिक ढांचा बेहद मजबूत था। इन्होंने अपनी खुद की मुद्रा प्रणाली विकसित की थी और अल्मोड़ा में शाही टकसाल (Mint) की स्थापना की थी। भोटिया और तिब्बती व्यापारियों के साथ व्यापार को बढ़ावा देने के लिए ‘सिरती प्रणाली’ (एक प्रकार का नकद कर) लागू की गई थी। [1]
कला और वास्तुकला की अनमोल धरोहर
आज कुमाऊं में दिखने वाले प्रसिद्ध मंदिर, जैसे अल्मोड़ा का नंदा देवी मंदिर, जागेश्वर धाम के कुछ मंदिर समूह और बालेश्वर मंदिर (चंपावत) के जीर्णोद्धार व निर्माण में चंद राजाओं का बड़ा योगदान रहा। इनके समय में ‘कुमाऊंनी संस्कृति’ और ‘कुमाऊंनी भाषा’ का सबसे ज्यादा विकास हुआ।
राजशाही का अंत और गोरखा आक्रमण (The Downfall – 1790)
18वीं सदी के अंत तक आते-आते आंतरिक गुटबाजी और कमजोर कूटनीति के कारण चंद वंश का पतन शुरू हो गया। साल 1790 में नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊं पर आक्रमण कर दिया। हवालबाग के युद्ध में अंतिम चंद राजा महेंद्र चंद की पराजय के साथ ही कुमाऊं से चंद राजवंश का गौरवशाली शासन हमेशा के लिए समाप्त हो गया और यहां गोरखा राज (गोरख्याणी) की शुरुआत हुई।
