एक साथ तड़पकर मरी थीं 50,000 रूहें।
साल था 1990… पहाड़ियों की गोद में बसी यह खदान मुनाफा कमाने की अंधी हवस का केंद्र बन चुकी थी। सुरक्षा के कायदे सिर्फ कागजों पर थे और खदान की गहराइयों में कफन बुना जा रहा था।
वो काली और दमघोंटू सुबह…
चूने की बारीक, जानलेवा धूल हवा में जहर घोल रही थी। करीब 50,000 मजदूर बिना यह जाने उस सुरंग में उतरे कि वे अपनी कब्र की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। अचानक, एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई… और खदान का एक बहुत बड़ा हिस्सा ढह गया!
चूने की बारीक, जानलेवा धूल हवा में जहर घोल रही थी। करीब 50,000 मजदूर बिना यह जाने उस सुरंग में उतरे कि वे अपनी कब्र की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। अचानक, एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई… और खदान का एक बहुत बड़ा हिस्सा ढह गया!
- तड़प और चीखें: सैकड़ों मजदूर जिंदा मलबे के नीचे दफन हो गए। जो बच गए, उनके फेफड़ों में चूने के तीखे कण इस कदर बैठ चुके थे कि वे खून की उल्टियां करते हुए, अपनी छाती पीट-पीटकर, तड़प-तड़पकर मरने लगे।
- एक खौफनाक कब्रिस्तान: मौत का तांडव इतना भयानक था कि लाशों को कफन तक नसीब नहीं हुआ। अपनों को ढूंढने वाला कोई नहीं बचा था। देखते ही देखते वह हँसती-खेलती जगह एक विशाल, बेनाम कब्रिस्तान में तब्दील हो गई।
प्रशासन ने आनन-फानन में इस जगह को सील कर दिया। लेकिन वो यह भूल गए कि इंसानी जिस्म तो मर जाते हैं… पर अधूरी मौत मरे 50,000 लोगों का गुस्सा और उनका दर्द कभी नहीं मरता। वे आज भी वहीं हैं, उसी मलबे के नीचे, अंधेरे में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं…

