24 September 2026

‘एक आदेश’ ने हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की नींव!

देहरादून/पौड़ी:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, देवभूमि उत्तराखंड के एक जांबाज सैनिक की शहादत और हौसले की कहानी सोने के अक्षरों में चमकेगी। हम बात कर रहे हैं वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की, जिन्होंने साल 1930 में ब्रिटिश हुकूमत के सबसे क्रूर आदेश के सामने झुकने से साफ मना कर दिया था।
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क्या था वो ‘पेशावर कांड’ जिसने इतिहास बदल दिया?
बात 23 अप्रैल 1930 की है। आज के पाकिस्तान के पेशावर के ‘किस्सा ख्वानी बाजार’ में हजारों निहत्थे स्वतंत्रता सेनानी (खुदाई खिदमतगार) खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। ब्रिटिश सरकार घबरा गई। कैप्टन रिकेट ने रॉयल गढ़वाल राइफल्स की टुकड़ी को प्रदर्शनकारियों को घेरने और उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसाने का आदेश दिया।
माहौल में तनाव था, बंदूकें तन चुकी थीं। तभी हवलदार मेजर चंद्र सिंह भंडारी की कड़कती आवाज गूंजी— “गढ़वाली सीज फायर! (गढ़वाली गोली मत चलाओ)”। सैनिक ठहर गए। ब्रिटिश अफसर ने गुस्से में पूछा कि आदेश क्यों टाला? तब चंद्र सिंह ने सीना तानकर कहा, “ये हमारे देशवासी हैं, और हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते।”
बैरिस्टर मुकुंदीलाल ने बचाया था जीवन
इस सैन्य विद्रोह से ब्रिटिश हुकूमत हिल गई। चंद्र सिंह समेत गढ़वाली सैनिकों का कोर्ट मार्शल किया गया। अंग्रेजों ने उन्हें मौत की सजा (फांसी) देने की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन उत्तराखंड के मशहूर वकील बैरिस्टर मुकुंदीलाल ने अदालत में उनका केस लड़ा और सूझबूझ से फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलवाया। उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई और उन्हें 11 साल से अधिक समय देश की अलग-अलग जेलों में काटना पड़ा।
महात्मा गांधी ने कहा था- ‘अगर मेरे पास एक और चंद्र सिंह होता…’
जब चंद्र सिंह जेल से छूटे, तो उनकी वीरता की गूंज पूरे देश में थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने चंद्र सिंह भंडारी को ‘गढ़वाली’ उपनाम (Title) दिया, जिसके बाद वे हमेशा के लिए ‘वीर चंद्र सिंह गढ़वाली’ कहलाए। गांधी जी ने एक जनसभा में कहा था, “यदि मेरे पास वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे कुछ और सैनिक होते, तो भारत बहुत पहले आजाद हो गया होता।”
आजादी के बाद का जीवन और विरासत
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन इस महानायक ने कभी भी सत्ता या मलाईदार पदों की लालसा नहीं की। वे लगातार उत्तराखंड के विकास, पहाड़ों में शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों के लिए लड़ते रहे। 1 अक्टूबर 1979 को दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इस महान देशभक्त ने अंतिम सांस ली। आज उत्तराखंड सरकार ने उनके सम्मान में ‘वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना’ भी शुरू की है, जो युवाओं को आत्मनिर्भर बना रही है।

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