29 October 2026

घसियारी सिर्फ एक महिला नहीं, एक व्यवस्था है

The Great घसियारी – उत्तराखंड की रीढ़उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, इसकी सुंदरता को देखकर कहा जाता है। पर इस सुंदरता के पीछे, इस पहाड़ को थामे हुए हैं – दो मजबूत हाथ। एक किसान के और दूसरे उसकी घसियारी के।घसियारी – शब्द सुनने में जितना सरल है, इस शब्द की जिंदगी उतनी ही कठिन।सुबह सूरज से पहले शुरू होती है उसकी सुबहपहाड़ में सूरज देर से आता है, पर घसियारी उससे पहले उठ जाती है। सुबह 4 बजे। सबसे पहले चूल्हा जलाना, फिर गाय-भैंस को चारा-पानी, फिर पूरे परिवार के लिए भात-दाल बनाना।बच्चे अभी नींद में होते हैं, उन्हें उठाना, तैयार करना, स्कूल भेजना। सास-ससुर बुजुर्ग हैं, उनकी दवा-पानी, उनका खाना। एक गृहिणी की सारी जिम्मेदारियां वो निपटाती है, बिना किसी छुट्टी के।और फिर शुरू होता है उसका असली संघर्ष।पीठ पर दरांती, हाथ में रस्सीअपने डंगरों के लिए, अपने पशुओं के लिए घास लेने जाना – ये सिर्फ एक काम नहीं, जिंदगी है।

कंधे पर दरांती, पीठ पर बड़ी टोकरी जिसे पहाड़ में ‘कुट्टा’ या ‘कंडी’ कहते हैं, और हाथ में रस्सी।कई गांवों में घास पास में नहीं मिलती। 3-4 किलोमीटर दूर, खड़े पहाड़ों पर, तिरछे खेतों की मेड़ों पर जाना पड़ता है। जहाँ एक पैर फिसला तो सीधे खाई में।बारिश हो, तब भी जाना है। क्योंकि गाय भूखी रहेगी तो दूध कहाँ से आएगा। तेज धूप हो, तब भी जाना है। बर्फ गिर रही हो, तब भी जाना है। कोहरा, तूफान – प्रकृति का कोई भी रूप उसे रोक नहीं सकता।वहाँ बैठकर वो घास काटती है। एक-एक मुट्ठी घास के साथ उसकी हथेलियों में छाले पड़ते हैं, कभी दरांती से हाथ कट जाता है, पर वो उफ तक नहीं करती।फिर उस भारी गट्ठर को सिर पर रखकर, पहाड़ की चढ़ाई चढ़कर घर लाना। 30-40 किलो का बोझ। एक जवान लड़का भी एक बार में थक जाए, पर वो रोज लाती है।वो अपने लिए जीना ही भूल जाती हैघर आकर फिर वही चूल्हा, फिर वही बर्तन, फिर रात को जानवरों को चारा डालना।बच्चों को होमवर्क कराना, पति के कपड़े धोना, बड़े-बुजुर्गों के पैर दबाना।पूरे दिन में कभी उसने अपने बारे में सोचा ही नहीं। उसके लिए नया सूट क्या है, लिपस्टिक क्या है, आराम क्या है – उसे पता ही नहीं। उसकी सुंदरता उसके पसीने में है, उसकी बिंदी में है जो धूप में भी चमकती है।वो हँसती भी है तो पूरे पहाड़ में उसकी हँसी गूंजती है, पर उस हँसी के पीछे कितनी थकान छुपी है, ये सिर्फ पहाड़ जानता है।घसियारी सिर्फ एक महिला नहीं, एक व्यवस्था हैअगर उत्तराखंड की घसियारी एक दिन घास लेने न जाए, तो पहाड़ की अर्थव्यवस्था रुक जाएगी। पशुपालन खत्म, दूध खत्म, खेती के लिए गोबर खत्म।वो सिर्फ घास नहीं काट रही, वो पहाड़ को जिंदा रख रही है। वो परिवार को बांधे हुए है, संस्कृति को बचाए हुए है, और आने वाली पीढ़ी को सिखा रही है कि संघर्ष क्या होता है।इसलिए वो महान है।

The Great घसियारी।हमें उन्हें सम्मान देना चाहिए। उनके लिए चारा बैंक, पास में घास की नर्सरी, उनके स्वास्थ्य की जांच, और सबसे जरूरी – उनके काम को ‘काम’ के रूप में पहचान।कभी मिलो किसी घसियारी से, उसके पैर छूना। क्योंकि उसके पैरों में पूरे उत्तराखंड की मिट्टी लगी है।

Upendra Panwar

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