पित्थूवाला पॉलिटेक्निक में परीक्षा के दौरान सीसीटीवी में संदिग्ध गतिविधियों में पकड़े गए एक छात्र को जब शिक्षकों ने टोका, तो उसने अपने पिता के पुलिस में होने की धौंस जमाई। हद तो तब हो गई जब अगले दिन छात्र के पिता—पुलिस दूरसंचार शाखा में तैनात उपनिरीक्षक (SI) महेश कंडवाल—अपने साथियों के साथ कॉलेज के परीक्षा कंट्रोल रूम में जबरन घुस गए।

CCTV फुटेज में साफ दिख रहा है कि कैसे एक दरोगा ने पद की गरिमा को ताक पर रखकर वहां मौजूद शिक्षकों को थप्पड़ जड़े, कुर्सियां उठाकर मारीं और महिला कर्मचारियों के साथ अभद्रता की। बेटे की गलती सुधारने और उसे सही राह दिखाने के बजाय, खुद दरोगा ने अपनी वर्दी की ताकत का इस्तेमाल गुंडागर्दी के लिए किया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह कैसी हरकत?
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत समानता और न्याय पर टिका है। कोई व्यक्ति चाहे कितने भी ऊंचे सरकारी पद पर क्यों न हो, उसे किसी भी नागरिक, विशेषकर अपनी ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारियों या शिक्षकों पर हिंसा करने की छूट नहीं दी जा सकती।

- जवाबदेही कहां है?: पुलिस का काम समाज में शांति व्यवस्था बनाए रखना और अपराधियों पर नकेल कसना है। लेकिन जब एक सब-ईस्पेक्टर खुद एक शिक्षण संस्थान को अखाड़ा बना दे, तो आम जनता खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करेगी?
- वर्दी सुरक्षा के लिए है, खौफ के लिए नहीं: खाकी का रौब अपराधियों में होना चाहिए, न कि परीक्षा ले रहे प्रोफेसरों और महिला कर्मियों में। यह हरकत साफ दर्शाती है कि कुछ अधिकारियों के भीतर अब भी सामंती और तानाशाही सोच जिंदा है, जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं।
एसएसपी की कार्रवाई, पर क्या इतना काफी है?
मामले की गंभीरता को देखते हुए एसएसपी देहरादून प्रमेन्द्र सिंह डोबाल ने तत्परता दिखाई और दरोगा महेश कंडवाल को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है। पुलिस ने दोनों पक्षों की क्रॉस FIR भी दर्ज की है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ निलंबन (सस्पेंशन) ऐसे अहंकार को तोड़ने के लिए काफी है?
इस घटना के खिलाफ पूरे पॉलिटेक्निक का शिक्षक संघ एकजुट हो चुका है और काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज करा रहा है। शिक्षकों का यह आक्रोश सिर्फ इस एक घटना के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था और सोच के खिलाफ है जो उन्हें काम के दौरान सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पाती।
