6 November 2026

कंडोली-बिधोली पुल आधुनिक निर्माण तकनीक को दे रहा कड़ी चुनौती देहरादून

देहरादून। आधुनिक दौर में जहाँ लाखों-करोड़ों की लागत से बनने वाले नए पुल और सड़कें कुछ ही महीनों या सालों में जर्जर हो जाते हैं, वहीं देहरादून जिले में एक ऐसा पुल भी है जो पिछली एक सदी से अडिग खड़ा है। कंडोली और बिधोली को जोड़ने वाला यह ऐतिहासिक पुल आज भी उतना ही मजबूत है, जितना अपने निर्माण के समय था।
यह पुल न केवल दो इलाकों को आपस में मिलाता है, बल्कि एक बहुत बड़े क्षेत्र की आबादी को सीधे राजधानी देहरादून से जोड़ने का मुख्य जरिया है। इस व्यस्त मार्ग पर रोजाना सैकड़ों हल्के और भारी वाहन बिना किसी डर के गुजरते हैं।
कभी नहीं पड़ी मरम्मत की जरूरत
इस पुल की सबसे हैरान करने वाली बात इसकी बेजोड़ मजबूती है। अपने पूरे जीवनकाल में यह पुल न तो कभी टूटा और न ही आज तक इसे किसी बड़ी मरम्मत (Maintenance) की जरूरत पड़ी है। हर साल आने वाली भारी बारिश, बाढ़ और मौसम के उतार-चढ़ाव भी इस पुल का बाल बांका नहीं कर पाए हैं।
100 साल से भी ज्यादा पुराना है इतिहास
स्थानीय निवासी अनुराधा ने इस पुल के गौरवशाली इतिहास को साझा करते हुए बताया, “यह पुल हमारे दादा जी के बचपन के समय का है। अगर आज वो जीवित होते, तो उनकी उम्र 100 साल से ज्यादा होती। इस लिहाज से यह पुल 100 वर्ष से भी कहीं अधिक पुराना है।” अनुराधा की यह बात प्रमाणित करती है कि यह पुल ब्रिटिश काल (British Era) में बनाया गया था।
आधुनिक इंजीनियरिंग पर खड़े होते हैं सवाल
ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान हुआ यह बेमिसाल निर्माण आज के दौर के आधुनिक इंजीनियरों और ठेकेदारों के सामने एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। यह पुल चीख-चीख कर समकालीन निर्माण व्यवस्था से पूछ रहा है—“तुम कैसा निर्माण करते हो जो कुछ ही समय बाद ढह जाता है?”
जहाँ आज की तकनीक, सीमेंट और कंक्रीट से बने पुल चंद सालों में ही दरकने लगते हैं, वहीं ब्रिटिश काल का यह पुल आज भी पूरी मजबूती के साथ अपनी सेवाएं दे रहा है। यह प्रशासन और आज के योजनाकारों के लिए सीखने का एक बेहतरीन उदाहरण है कि टिकाऊ और ईमानदार निर्माण किसे कहते हैं।
Upendra Panwar

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