7 August 2026

जब हुनर रह गया नजरों से दूर – भरत वीर की कहानी

एक लड़का था — नाम था भरत वीर। उसने महज़ 6 साल की उम्र में ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। क्रिकेट उसके खून में था, क्योंकि उसके पिता भी एक क्रिकेटर रह चुके थे। पिता का पूरा समर्थन मिला, और यही समर्थन धीरे-धीरे उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

भरत वीर एक बेहतरीन तेज गेंदबाज़ था और साथ ही मध्यम क्रम का भरोसेमंद बल्लेबाज़ भी। जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसके खेल में निखार आता गया। मैदान पर उसकी रफ्तार, उसकी लाइन-लेंथ और बल्लेबाज़ी की समझ लोगों को प्रभावित करने लगी। धीरे-धीरे हर किसी की जुबान पर बस एक ही नाम था — भरत वीर

उसकी मेहनत रंग लाई और उसे दिल्ली की तरफ से BCCI सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी खेलने का मौका मिला। इसके बाद 2007-08 में उसने सीके नायडू ट्रॉफी में भी अपना शानदार प्रदर्शन दिखाया। इस दौरान उसे रजत भाटिया, पवन नेगी, परमेंदर अवाना, राहुल शर्मा और पवन सुयाल जैसे खिलाड़ियों के साथ खेलने का अवसर मिला। इन सभी खिलाड़ियों ने भारत वीर के खेल की जमकर तारीफ की।

यही नहीं, जब इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड की टीमें भारत दौरे पर आईं, तब भरत वीर को नेट बॉलर के रूप में अंतरराष्ट्रीय गेंदबाज़ों को गेंदबाज़ी करने का मौका भी मिला। यह उसके लिए बहुत बड़ा अनुभव था, जिसने उसके आत्मविश्वास को और मज़बूत किया।

भरत वीर ने विद्या जैन स्कूल में सुरक्षा कर्मी की नौकरी करते हुए वहाँ की क्रिकेट पिच भी तैयार की। इस पिच पर आकाश चोपड़ा जैसे बड़े खिलाड़ी भी खेलने आया करते थे। उत्तराखंड और नॉर्थ इंडिया के लगभग हर बड़े टूर्नामेंट में भारत वीर ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

लेकिन किस्मत ने उसका पूरा साथ नहीं दिया। इतनी प्रतिभा होने के बावजूद वह BCCI की नज़रों में पूरी तरह नहीं आ पाया। कहीं न कहीं उसके हुनर के साथ अनदेखी हुई। उसकी खराब आर्थिक स्थिति और सेहत से जुड़ी परेशानियों ने भी उसके करियर को प्रभावित किया।

आज भारत वीर UPES में नौकरी करके अपनी आजीविका चला रहा है। लेकिन उसके अंदर का क्रिकेटर आज भी ज़िंदा है। जब भी उसे मौका मिलता है, वह बल्ला और गेंद उठाकर मैदान में उतर जाता है।

भरत वीर की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस जज़्बे की कहानी है जो परिस्थितियों से हार नहीं मानता। वह क्रिकेट का एक ऐसा सूरज है, जो ढलते हुए भी अपनी रोशनी से प्रेरणा देता रहता है।

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