364 दिन इंसान का आना मना! रक्षाबंधन पर सिर्फ कुछ घंटों के लिए खुलता है यह रहस्यमयी मंदिर, वजह जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे!
उत्तराखंड (उर्गम घाटी): देवभूमि उत्तराखंड अपनी गोद में न जाने कितने अलौकिक और अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। आज हम आपको हिमालय की गोद में छिपे एक ऐसे ही चमत्कारी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में जानकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। अमूमन मंदिरों के कपाट भक्तों के लिए सालभर खुले रहते हैं, लेकिन उत्तराखंड के चमोली जिले की खूबसूरत उर्गम घाटी में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जो साल के 364 दिन पूरी तरह बंद रहता है और सिर्फ रक्षाबंधन के दिन, सूर्योदय से सूर्यास्त तक के लिए खोला जाता है।
हम बात कर रहे हैं समुद्र तल से लगभग 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित ‘श्री वंशी नारायण मंदिर’ की! आइए जानते हैं इस मंदिर के पीछे का वो हैरान कर देने वाला सच, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा।
🤫 इंसानों को सिर्फ 1 दिन की अनुमति, बाकी 364 दिन कौन करता है पूजा?
पौराणिक मान्यताओं और स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मंदिर में इंसानों को साल में सिर्फ एक बार (रक्षाबंधन पर) कदम रखने की इजाजत है। बाकी के 364 दिन इस निर्जन और दुर्गम हिमालयी चोटी पर स्थित मंदिर में कोई इंसान नहीं फटकता। माना जाता है कि बचे हुए पूरे साल यहाँ स्वयं देवर्षि नारद गुप्त रूप से आकर भगवान नारायण की आराधना करते हैं। अगर कोई इंसान इस नियम का उल्लंघन करने की कोशिश करता है, तो उसे भारी विपत्ति का सामना करना पड़ता है।
🎀 महिलाएं भगवान को मानती हैं भाई, सबसे पहले चढ़ती है राखी
इस मंदिर की सबसे खूबसूरत और अनोखी परंपरा यह है कि रक्षाबंधन के दिन उर्गम घाटी की सैकड़ों महिलाएं और युवतियां कई किलोमीटर का बेहद कठिन और खड़ी चढ़ाई वाला ट्रेक पार कर यहाँ पहुँचती हैं। अपने सगे भाइयों को राखी बांधने से पहले, वे भगवान वंशी नारायण को रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं और उन्हें अपना भाई मानती हैं।
🧈 हर घर से आता है मक्खन, एक अनोखी प्रतिमा!
इस विशेष दिन पर घाटी के कलकोठ (Kalkoth) गांव के हर एक घर से भगवान के लिए ताज़ा मक्खन (Butter) का भोग आता है। इसी मक्खन से भगवान का विशेष श्रृंगार और महाप्रसाद तैयार किया जाता है। कत्यूरी स्थापत्य शैली में बने इस 10 फीट ऊंचे पत्थरों के मंदिर के भीतर भगवान विष्णु की बेहद सुंदर चतुर्भुज मूर्ति स्थापित है। दिलचस्प बात यह है कि इस मूर्ति में भगवान कृष्ण और देवों के देव महादेव (शिव) दोनों की झलक एक साथ देखने को मिलती है।
🏔️ पाताल लोक से जुड़े हैं तार!
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु दानवीर राजा बलि के वचन में बंधकर पाताल लोक चले गए थे, तब माता लक्ष्मी बेहद चिंतित हो गई थीं। तब नारद मुनि ने ही माता लक्ष्मी को युक्ति सुझाई थी कि वे राजा बलि को भाई बनाकर राखी बांधें और बदले में उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को मांग लें। माता लक्ष्मी ने ऐसा ही किया। पाताल लोक से मुक्त होने के बाद भगवान विष्णु सबसे पहले इसी पावन धरती पर प्रकट हुए थे। चूंकि उस दिन नारद जी वहाँ मौजूद नहीं थे, इसलिए स्थानीय जाख पुजारियों ने भगवान की पूजा-अर्चना की थी, और तभी से यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
अगर आप भी इस बार रक्षाबंधन पर कुछ अलग और आध्यात्मिक अनुभव करना चाहते हैं, तो प्रकृति के अद्भुत नजारों और रहस्यों से भरे श्री वंशी नारायण मंदिर की यात्रा का प्लान ज़रूर बनाएं!
(ब्यूरो रिपोर्ट: Uttrakhand Manthan )
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