हिमालय का वो खौफनाक राज
चमोली (उत्तराखंड)। हिमालय की दुर्गम गोद में बसा रूपकुंड (Roopkund) सदियों से वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और पर्यटकों के लिए एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है। समुद्र तल से लगभग 5,029 मीटर (16,500 फीट) की ऊंचाई पर स्थित इस बर्फीले ताल को दुनिया ‘रहस्यमयी झील’ (Mystery Lake) या ‘कंकालों की झील’ के नाम से जानती है। सर्दियों में पूरी तरह बर्फ की चादर में लिपटी रहने वाली इस झील के नीचे दबे सैकड़ों इंसानी कंकाल आज भी कई खौफनाक और हैरान करने वाले सवाल खड़े करते हैं।
😮 क्या है कंकालों का असली सच?
जब गर्मियों के मौसम में रूपकुंड की बर्फ पिघलती है, तो इसके तल और किनारों पर बिखरे हुए मानव कंकाल, खोपड़ियां और हड्डियां साफ नजर आने लगती हैं। साल 1942 में नंदा देवी गेम सेंचुरी के रेंजर एच. के. माधवल ने पहली बार आधिकारिक तौर पर इन कंकालों की खोज की थी। शुरुआत में लगा कि ये किसी युद्ध या महामारी में मारे गए लोगों के शव हैं, लेकिन जब आधुनिक विज्ञान ने इसकी जांच की, तो नतीजे चौंकाने वाले निकले।
🧬 डीएनए (DNA) जांच ने बदला इतिहास
साल 2019 में नेशनल जियोग्राफिक और वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इन कंकालों के डीएनए की जांच की। इस रिसर्च में बेहद चौंकाने वाली बातें सामने आईं:
- अलग-अलग समय काल: ये मौतें किसी एक दुर्घटना में नहीं हुईं। यहाँ मौजूद कंकाल दो अलग-अलग कालखंडों के हैं। कुछ कंकाल 9वीं सदी (लगभग 850 ईस्वी) के हैं, जबकि कुछ कंकाल 19वीं सदी के आसपास के हैं।
- विदेशी नागरिकों के कंकाल: सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से कुछ कंकालों का जेनेटिक संबंध भूमध्य सागर (Mediterranean) क्षेत्र, विशेषकर ग्रीस (Greece) और क्रीट द्वीप के लोगों से पाया गया है। यूनान के लोग इतनी ऊंचाई पर क्या कर रहे थे, इसका सटीक जवाब आज भी किसी के पास नहीं है।
⛈️ मौत की वजह: आसमान से बरसे ‘पत्थर जैसे ओले’
वैज्ञानिकों की थ्योरी के अनुसार, यहाँ मारे गए लोगों की खोपड़ियों और हड्डियों पर फ्रैक्चर के निशान मिले हैं। यह चोटें किसी धारदार हथियार या बंदूक की नहीं हैं। माना जाता है कि ये लोग अचानक आए भीषण लाट तूफान (भयानक ओलावृष्टि) की चपेट में आ गए थे। क्रिकेट की गेंद के आकार (लगभग 9 इंच व्यास) के भारी ओलों की मार से बचने के लिए इस खुले इलाके में कोई छिपने की जगह नहीं थी, जिसके कारण सभी की मौके पर ही मौत हो गई।
🕉️ पौराणिक मान्यता: माता पार्वती और राजा जशधवल की कथा
स्थानीय लोक कथाओं और गढ़वाल की सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान नंदा देवी राजजात यात्रा के मार्ग में आता है। कहा जाता है कि कन्नौज के राजा जशधवल अपनी गर्भवती रानी और लाव-लश्कर के साथ नंदा देवी के दर्शन के लिए निकले थे। यात्रा के कड़े नियमों का उल्लंघन करने और नाच-गाने से देवी मां क्रोधित हो गईं। उन्होंने भयंकर ओलावृष्टि की, जिससे पूरा दल इस कुंड में समा गया। स्थानीय लोग आज भी गाए जाने वाले लोकगीतों में इस घटना का जिक्र करते हैं।
🥾 एडवेंचर प्रेमियों के लिए जन्नत
रहस्यों से इतर, रूपकुंड उत्तराखंड के सबसे रोमांचक और खूबसूरत ट्रेकिंग रूट्स में से एक है। लोहाजंग से शुरू होने वाला यह ट्रेक बेदनी बुग्याल और अली बुग्याल के विशाल मखमली घास के मैदानों से होकर गुजरता है। रास्ते में दिखने वाली नंदा घुंघटी और त्रिशूल चोटियों के नजारे ट्रैकर्स को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। हालांकि, कम ऑक्सीजन और बेहद कठिन चढ़ाई के कारण इसे एक चुनौतीपूर्ण ट्रेक माना जाता है।
रहस्य, रोमांच और आस्था का यह अद्भुत संगम आज भी वैज्ञानिकों को रिसर्च करने और एडवेंचर प्रेमियों को अपनी ओर खींचने के लिए मजबूर करता है। रूपकुंड आज भी हिमालय के सीने में दफन एक ऐसा राज है, जिसका पूरा सच शायद कभी सामने नहीं आ पाएगा।

