चमोली के गांव में मिला 5.2 किलो का सोने का मुखौटा, पाकिस्तान से जुड़े तार!
चमोली (उत्तराखंड): देवभूमि उत्तराखंड न सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता बल्कि अपने भीतर दबे सदियों पुराने रहस्यों के लिए भी जानी जाती है। ऐसा ही एक हैरान कर देने वाला ऐतिहासिक रहस्य छिपा है चमोली जिले के भारत-चीन सीमा पर स्थित मलारी गांव में, जहाँ पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान 5.2 किलोग्राम शुद्ध सोने का एक प्राचीन मुखौटा (गोल्ड मास्क) मिला था। इसे आम बोलचाल में लोग सोने का मुकुट भी कहते हैं।
गढ़वाल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा की गई इस खोज ने न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर के इतिहासकारों को चौंका दिया था। आइए जानते हैं इस महा-खोज से जुड़े वो दिलचस्प तथ्य, जो उत्तराखंड के इतिहास को एक नया मोड़ देते हैं।
500 ईसा पूर्व पुराना है इतिहास
पुरातत्वविदों के अनुसार, मलारी गांव के प्राचीन शवाधानों (Burial Sites) से मिला यह सोने का मुखौटा लगभग 500 ईसा पूर्व (करीब 2500 साल पुराना) माना जाता है। यह मुखौटा बेहद कलात्मक तरीके से बनाया गया है, जो यह दर्शाता है कि उस दौर में भी यहाँ के लोगों के पास धातु विज्ञान (Metallurgy) और आभूषण बनाने की उन्नत तकनीक मौजूद थी।
इंसानी शवों के साथ दफनाया गया था खजाना
मलारी गांव में हुई खुदाई के दौरान जमीन के नीचे कई प्राचीन गुफानुमा कब्रें मिलीं। इन शवाधानों की खासियत यह थी कि यहाँ शवों को घुटने मोड़कर (Unduplicated/Flexed Position) दफनाया गया था। इन्हीं में से एक मुख्य शव के चेहरे पर यह 5.2 किलो का सोने का मुखौटा लगा हुआ था।
सोने के साथ मिला ‘रहस्यमयी’ पशु का कंकाल
इस खुदाई की सबसे अनोखी बात यह थी कि इंसानी कंकालों के ठीक बगल में एक पूरे पशु का कंकाल भी दफनाया गया था। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के अनुसार, यह कंकाल हिमालयी कस्तूरी मृग (Musk Deer) या फिर किसी जंगली घोड़े का हो सकता है। इसके अलावा यहाँ से:
- कांस्य (Bronze) से बने अनोखे बर्तन
- लोहे के प्राचीन हथियार और उपकरण
- बेहद खूबसूरत नक्काशी वाले मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) भी बरामद किए गए थे।
पाकिस्तान की ‘स्वात घाटी’ से क्या है कनेक्शन?
इतिहासकारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि तिब्बत सीमा के पास बसे इस छोटे से गांव का संबंध कहां से था? जब शोधकर्ताओं ने मलारी में मिले मिट्टी के बर्तनों और सोने के मुखौटे का अध्ययन किया, तो पाया कि इसकी बनावट पाकिस्तान की ‘स्वात घाटी’ (Swat Valley) में मिली प्राचीन गांधार कब्र संस्कृति से हूबहू मिलती है।
इस समानता ने यह साबित कर दिया कि हजारों साल पहले भी उत्तराखंड का यह दुर्गम हिमालयी क्षेत्र कटा हुआ नहीं था, बल्कि यहाँ से तिब्बत, मध्य एशिया और गांधार (वर्तमान पाकिस्तान/अफगानिस्तान) तक व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध बेहद मजबूत थे।
गढ़वाल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी
इस ऐतिहासिक धरोहर को दुनिया के सामने लाने का श्रेय हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (HNBGU) के इतिहास व पुरातत्व विभाग को जाता है। डॉ. शिव प्रसाद डबराल के शुरुआती शोध के बाद, प्रो. विनोद नौटियाल और उनकी टीम ने साल 2001-2002 में विस्तृत उत्खनन कर इस 5.2 किलो के सोने के मुखौटे और अन्य अवशेषों को सुरक्षित निकाला था।
आज भी मलारी गांव की यह खोज शोधकर्ताओं के लिए एक पहेली बनी हुई है कि आखिर वह कौन सी समृद्ध सभ्यता थी जो अचानक इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई।

