7 August 2026

हाल ही में केदारनाथ में उपचुनाव संपन्न हुए जिसमे भाजपा प्रत्याशी आशा नौटियाल को जीत मिली दूसरे स्थान रहे कांग्रेस के मनोज रावत, उत्तररखण्ड में बड़ी सामान्य बात है कि हर चुनाव में ये दोनों दल पहले और दूसरे स्थान पर बारी बारी से रहते हैं, कभी कोई आगे तो कभी कोई पीछे बाकी दल / निर्दलीय बहुत ज्यादा वोटो को नहीं ले पाते हैं ना ही कोई प्रभाव छोड़ पाते हैं , अब ध्यान देने वाली बात यह है कि केदारनाथ चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे त्रिभुवन चौहान जिन्होंने वोटिंग से पहले इस मुकाबले को त्रिकोणीय बना कर रखा और और परिणाम आने पर लगवाब 10 हज़ार वोटो को लेकर अपनी छाप जनता के बीच छोड़ दी और पहली बार में सिमित संसाधनों के साथ केवल विचारधारा और व्यक्तिगत छवि के आधार पर लगवग 10 हज़ार वोटो को लाना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है जो कि भविष्य में बड़ा राजनीतिक चेहरा बन सकता है |

ठीक यही समीकरण देखने को मिला लोकसभा चुनाव में जहा टिहरी संसदीय सीट में भाजपा से कभी चुनाव ना हारने वाली माला राजलक्ष्मी और कांग्रेस से अनुभवी राजनेता जोत सिंह गुनसोला के सामने बेरोजगारी के मुद्दे को लेकर एक नया चेहरा बॉबी पंवार चुनाव के मैदान में उतरे उनका जन समर्थन देखकर इन दोनों दलों के माथे पर बल तो जरूर पड़ा होगा पर यह जन समर्थन वोटो में तब्दील नहीं हो पाया लेकिन फिर भी बॉबी पंवार ने लगभग 2 लाख वोट अपने पक्ष में कर के राजनितिक पंडितो को यह विचार करने पर मजबूर कर दिया कि उत्तराखंड की राजनीती में एक नया बीज अंकुरित हो चूका है।

आखिर क्या कारण है की उत्तराखंड में दोनों ही राजनितिक दल बीजेपी और कांग्रेस बड़े दल हैं लेकिन एक बड़ा तपका इन को नकार कर निर्दलीय प्रत्यासियो की ओर आकर्षित हो रहा है जिसके की कारण भी सामने आये हैं ये निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव के मंचो पर लच्छेदार बातो के जगह क्रांतिकारी विचारो को व्यक्त कर रहे हैं, इनकी राजनितिक यात्रा बहुत लम्बी नहीं है तो इनके ऊपर किसी प्रकार का दोषारोपण / आरोप न लगता है ना साबित होता है ये जनता /मतदाता के सीधे संपर्क में होते हैं सीधे उनकी समस्या पर बात करते हैं जबकि राष्टीय पार्टियों को अपने केंद्रीय नेतृत्व ओर नेताओ का गुणगान भी करना होता है चाहे उस चुनाव का केंद्रीय नेतृत्व से कोई मतलब हो या ना हो पर वही निर्दलीय प्रत्याशी केवल क्षेत्र विशेष की समस्या पर ही अपनी बातो को रखते हैं , ठीक जैसे तीन विधानसभा चुनावों से दिल्ली में हो रहा है दिल्ली के मुद्दों को लेकर मतदाता आम आदमी पार्टी को सत्ता सोपते हैं पूर्ण बहुमत के साथ, ओर जब लोक सभा के चुनाव होते हैं तो वही मतदाता बीजेपी को अपना मत देते हैं निशुल्क बिजली , पानी , परिवहन और शिक्षा की व्यस्ता ये आम आदमी से सीधा सम्बन्ध रखंते हैं , साथ ही राजनीती में आने से पहले आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल परिवर्तन नाम से एक NGO चलते थे जिसमे उन्होंने राशन की कालाबाज़ारी के लिए बहुत काम किया और सत्ता में आने के बाद राशन की काला बाजारी पर अंकुश लगा दिया और इस वितरण का सीधा सम्बन्ध हर मतदाता से होता है |

ठीक यही चुनावी मॉडल उत्तराखंड में भी देखा गया है कि निर्दलीय प्रत्यासियो ने जनता के उन ज्वलत मुद्दों को उठाया है है जो उन से सीधा सम्बन्ध रखता है जिसमे बेरोजगारी प्रमुख रूप से है , हलाकि दिल्ली कि तुलना में उत्तराखंड में बीजेपी – कांग्रेस के अलावा किसी को सत्ता नहीं मिली है पर निकट भविष्य में निर्दलीय प्रत्याशी राष्टीय दलों को बड़ी चुनौती देने के साथ कई राजनितिक समीकरणों को बना और बिगाड़ सकती ह।
उत्तराखंड मंथन उम्मीद करता है कि जिसे भी जनता कि सेवा करने का अवसर प्रदान हो वो पूरी ईमानदारी से जनता और राज्य कि सेवा करे।

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