कहा है महाभारत के “कर्ण” के कवच कुण्डल

दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्या महाभारत में यु तो हर किरदार महतयपूर्ण है लेकिन इस महाकाव्या में कुंती जेष्ट पुत्र कर्ण का भी बहुत महत्वपूर्ण किरदार है जो एक बहुत बड़े धनुर्धर के साथ बड़े दानी भी थे इनके मिलकर कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटा महाभारत युद्ध से पहले ही इंद्र भगवान ने “कर्ण” से उनके कवच कुंडल दान में मांग लिए थे, पर आखिर वो कवच कुण्डल हैं कहाँ आओ जाने।

किंवदन्ती की माने तो उत्तरखंड में ही कर्ण के कवच कुण्डल हैं जो की कर्ण मंदिर में रखे गए हैं जिनको देखने के लिए श्रदालु जाते रहते हैं और ये कर्ण मंदिर है कर्णप्रयाग नामक स्थान पर है जो बद्रीनाथ राष्टीय राजमार्ग में पड़ता हैं| क्यों की हम उत्तराखंड के पांच प्रयागो के बारे में पड़ रहे हैं तो कर्ण मंदिर के अलावा कर्णप्रयाग पांच प्रयागो में से एक है यहाँ पर जिन दो नदियों का संगम होता है वो हैं अलकनंदा और पिंडर।

अलकनदा जो की बद्रीनाथ से आती है साथ ही पिंडारी नदी पिंडारी गिलेशयर जो की बागेश्वर में है वहाँ से निकलती है , कर्णप्रयाग एक छोटा व्यस्त और खूबसूरत कस्बा हैं यहाँ महाविद्यालय, बड़ा अस्पताल के साथ तहसील भी है। यहाँ से एक मार्ग बद्रीनाथ के लिए जाता है और दूसरा जाता है कुमाऊ क्षेत्र के लिए।
