7 August 2026

उत्तराखंड ग्रामीण पर्यटन का नया चेहरा होम-स्टे

अगर आप भी शहरों के शोर-शराबे और कंक्रीट के जंगलों से ऊब चुके हैं, तो उत्तराखंड के शांत गांव आपकी रूह को सुकून देने के लिए तैयार हैं। हाल के वर्षों में उत्तराखंड में ‘होम-स्टे कल्चर’ केवल एक बिज़नेस नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बन गया है, जो पर्यटकों को होटलों की चमक-धमक से दूर सीधे “पहाड़ी चूल्हे” तक ले जा रहा है।
1. असली उत्तराखंड का अनुभव: होटल नहीं, अब होम-स्टे है ट्रेंड
आज का स्मार्ट टूरिस्ट सिर्फ नज़ारे नहीं देखना चाहता, बल्कि वहां की ज़िंदगी जीना चाहता है। उत्तराखंड के गाँवों जैसे सरमोली (पिथौरागढ़) और सारी (रुद्रप्रयाग) में पर्यटक अब स्थानीय परिवारों के साथ उन्हीं के घरों में रुक रहे हैं।
  • खासियत: सुबह की शुरुआत ताजी हवा और चिड़ियों की चहचहाहट के साथ होती है, और रात को पहाड़ी संस्कृति के लोकगीतों के बीच स्थानीय खान-पान का लुत्फ उठाया जाता है।
  • थाली में स्वाद: मंडुए की रोटी, गहत की दाल, और झंगोरे की खीर का वो देसी स्वाद अब सैलानियों की पहली पसंद बन चुका है।
2. सरकार का साथ और ‘बेस्ट टूरिज्म विलेज’ का खिताब
उत्तराखंड सरकार की ‘दीनदयाल उपाध्याय होम-स्टे योजना’ ने ग्रामीण पर्यटन को नई ऊंचाई दी है। सरकार पहाड़ी क्षेत्रों में होम-स्टे बनाने के लिए भारी सब्सिडी और ट्रेनिंग दे रही है।
  • हाल ही में केंद्र सरकार ने हर्षिल, जखोल (उत्तरकाशी), सीमांत गुंजी (पिथौरागढ़) और सौपी (नैनीताल) को भारत के ‘बेस्ट टूरिज्म विलेज’ अवार्ड से नवाजा है, जो उत्तराखंड के ग्रामीण पर्यटन की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
3. पलायन पर वार: युवाओं को मिल रहा रोज़गार
होम-स्टे केवल पर्यटकों को खुशी नहीं दे रहे, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन (Migration) को रोकने का सबसे बड़ा जरिया बन गए हैं। अब गाँव के युवा शहरों की नौकरी छोड़ अपने घर में ही होम-स्टे चलाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं।


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