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कही फिर विकेट कीपर का अकाल तो नहीं पड़ गया (एक समीक्षा) -

कही फिर विकेट कीपर का अकाल तो नहीं पड़ गया (एक समीक्षा)

यदि 90 के दशक की बात करे तो इसके शुरुवात में किरन मोरे विकेट के पीछे बेहतरीन कीपिंग किया करते थे मोरे ने 1992 का विश्वकप भी भारत के लिए खेला था , जावेद मियादार के साथ उनकी तीखी नोक झोक को कौन भूल सकता है ये नोक झोक 92 के वर्ल्ड कप में ही हुई थी।

मोरे के बाद कीपिंग के लिए चयन हुआ नयन मोंगिया का नयन मोंगिया एक कमाल विकेट कीपर थे साथ ही निचले क्रम पर बैटिंग भी कर सकते थे नयन मोंगिया के चयन के बाद लगा कि भारतीय क्रिकेट टीम की कीपर-बैट्समैन की समस्या का समाधान हो चूका है नयन मोंगिया ने 1996 और 1999 के विश्वकपो में भारतीय टीम के लिए बतौर कीपर-बैट्समैन अपनी सेवाए दी हैं , पर भारत के परस्पर अन्य देशो के विकेट कीपर के शुद्ध बल्लेबाज़ भी थे जो अपनी बल्लेबाज़ी के आधार पर मैचों को भी जीता रहे थे|

जिनमे गिलक्रिस्ट , संगकारा , एंडी फ्लावर , मार्क बुचर आदि बल्लेबाजी का धमाल मचा रहे थे इधर मोंगिया का बल्लेबाजी इन कीपरों की तुलना में सामान्य थी भारत को एक ऐसा कीपर चाहिए था जो एक अच्छा बल्लेबाज भी हो इस बात को मध्यनज़र रखते हुए भारत में कीपर बल्लेबाजो की खोज शुरू हुई जिसमे सबा करीम और MSK प्रसाद को पहले मौका दिया गया जो बस ठीक ठाक ही थे, 2003 का वर्ल्ड कप में एक नए कीपर को भारतीय टीम में जगह मिली नाम था पार्थिव पटेल जिनकी उम्र महज 16 थी पर इस पुरे वर्ल्ड कप में उनको एक भी मैच नहीं मिला उनके स्थान पर कीपिंग का जिम्मा सभाला राहुल द्रविड़ ने और द्रविड़ माध्यम क्रम के एक मजबूत बैट्समैन तो थे ही , पर दोनों फर्मेंट में द्रविड़ से कीपिंग करवाना सम्भव नहीं था इसलिए नए प्रयोग शुरू हुए जिसमे समीर दिघे , दिनेश कार्तिक , विजय दाहिया , दीपदास गुप्ता , अजय रात्रा , रोबिन उथपा के चहरो को मोके दिए गए पर बात पटरी पर नहीं बैठी ऐसा लगा की कीपर का अकाल सा पड़ गया हो|

इन्ही के बीच भारतीय टीम में मौका दिया गया महेंद्र सिंह धोनी  जिन्होंने आते ही भारतीय टीम का इंतज़ार खत्म कर डाला और फिर धोनी ने विकेट के पीछे और आगे ऐसा कमल किया कि लम्हे समय तक उन्होंने एक छत्र राज किया , जैसे ही धोनी ने अंतराष्टीय क्रिकेट को अलविदा कहा तब से अभी तक यह तय नहीं हो पा रहा कि कौन सा कीपर भारतीय टीम को स्थाई रूप से सेवा दे सकता है जो एक बढ़िया कीपर के साथ बल्लेबाज़ी में भी बढ़िया हाथ दखाये उस खोज के लिए बहुत से चेहरों को आजमाया जा रहा है रिसभ पंत एक दुर्घटना के शिकार बने हैं जो धीरे धीरे रिकवर कर रहे हैं उनके आवला नजर डाले नमन ओझा, शिखर भारत , ईशान किशन , संजू सैमसंग , KL राहुल , धुर्व जुरेल इतने सारे कीपरों के प्रयोगो को देखकर वो नयन मोंगिया वाला समय याद आ रहा है , क्या इस बार महेंद्र सिंह धोनी के जाने के बाद फिर से भारत में विकेट कीपरों का अकाल तो नहीं पड़ गया है अब निगाहे इस बात पर तिकी रहेगी कि अंततः किसकी स्थाई कीपर के रूप में टीम में जगह बनती है।

UTTRAKHAND MANTHAN 

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