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गुड़िया की दूकान ( एक कहानी ) -

गुड़िया की दुकान

 

 मैं एक शाम ऑफिस से घर जाते समय रोज की तरह जाम का सामना कर रह था गाड़िया रुक – रुक के चल रही थी, घर पहुंचने के कुछ किलोमीटर  पहले एक जाम लगा  हुआ था, गाड़ियों के जमावड़े के साथ हार्न की आवाज कानो को परेशान कर रही थी तभी अचानक मेरी नज़र अपनी बाई तरफ पड़ी जहाँ पर एक आदमी अपनी पुरानी सायकिल पकड़े था सायकिल की पीछे दो डिब्बे वाला एक टिफिन रखा था, आदमी के कपड़ो से थकान और बेहद निर्धनता झलक रही थी मेने अनुमान लगा दिया था कि ये व्यक्ति मेहनत और मजदूरी कर के अपने परिवार का पालन पोषण करता होगा, ये अनजान व्यक्ति अपने एक हाथ में सायकिल पकडे था और दूसरे हाथ में 100 का नोट इस नोट को वो एक बेहद साधारण दुकान के दूकानदार को देने का प्रयास कर रहा था पर मेरे अनुमान से दूकानदार मान नहीं रहा था शायद उसके पास पैसो कि कमी थी। फिर मेरी निगाह पड़ी उस दूकानदार कि दुकान पर वो दुकान खुले आसमान के नीचे एक खुली दुकान थी जो शायद किसी पलंग या बड़ी मेज पर रंगीन चादर से डेकोरेट कि गयी थी और वो दुकान थी गुडियो की|

 एक पल मे ही मेरी समझ मे गया कि वो आदमी गुड़िया खरीदना चाह रहा है पर उसके पास पुरे पैसे नहीं हैं। इससे पहले मे कुछ और देख या समझ पाता मेरे पीछे कई गाड़ियों ने हार्न देना शुरू कर दिया जाम खुल चूका  था मेने भी अपनी स्कूटी आगे  बड़ा ली फिर पता नहीं उसने वो गुड़िया खरीदी पाया  या नहीं पर जाने क्यों मेरे मन  मे कई विचार पैदा कर गयी वो छोटी सी गुड़िया कई दुकान

 

जब मैं घर आकर आराम से बिस्तर पर लेट गया तो लेटकर में सोचने लगा कि ये तो जाहिर था  कि गुड़िया खरीदने वाला बहुत गरीब था उसकी जरुरत दो वक़्त कई रोटी तन पर कपड़ा ही होगी फिर भी अपने मेहनत की कमाई से वो गुड़िया खरीद रहा था इसका मतलब उसके घर मे एक “बेटी” है और वो उसके लिए गुड़िया कि  शक्ल मे बहुत सारे जज्बात और  सपने खरीद रहा था , अगर वो गुड़िया खरीद पाया होगा तो उस बेटी ने उस गुड़िया से खेलकर अनगिनत यादे जोड़ दी होंगी जो उसके लिए जीवन भर किसी खजाने से कम नहीं होंगी गुड़िया और बेटी ये दो शब्द एक दूसरे के पूरक हैं अगर आप किसी अनजान बेटी (लड़की ) को मिलो जिसका नाम आप नहीं जानते होंगे तो आप उसे गुड़िया कहकर ही सम्बोधित कर सकते हैं। हर लड़की कई कुछ कुछ यादे गुड़िया के साथ जुडी होती हैं गुड़िया का शृंगार , उसकी शादी , उसके लिए कपडे बनानां , उससे बाते करना बहुत अनोखी है ये गुड़िया की दुनिया कभी तो लगता ही नहीं कि इस रबर कई गुड़िया के अंदर जान नहीं है बेटियाँ (लड़किया ) उसका इतना ख्याल रखती हैं मुझे लगता है परिवार को संभालना और गृहस्त जीवन को जीना खेल खेल मे गुड़िया ही बेटियों को सिखाती है , शायद ही बेटियों के लिए गुड़िया से बेहतर कोई खिलौना हो इसके परस्पर बेटो कई बात कई जाए  तो उनकी पसंद एक नहीं कई खिलोने होते हैं जैसे बन्दुक , बाज़ा , हवाई जहाज आदि|

लड़को का जुड़ाव किसी खिलोने से इतना नहीं होता जितना लड़कियों का गुड़िया से होता है हमारी गुड़िया ( बेटियाँ ) सच में गुड़िया ही हैं जो एक निर्जीव गुड़िया को इतना  स्नेह और उनका इतना ख्याल रखती हैं तो परिवार का क्यों नहीं रखेगी ?

हर माँ – बाप को अपनी गुड़िया (बेटी) को एक प्यारी सी  गुड़िया जरूर देनी चाहिए ताकि वो आपके लिए हमेशा एक गुड़िया ही  बनी  रहे।  मुझे नहीं पता की मेरी कहानी गुड़िया की दुकान कितने लोग पड़ेगे पर जो भी पड़े वो किसी एक लड़की को जो गरीब हो , कूड़ा जमा करती हो , मजबूरी से भीख मांगती हो, चौराह पर कुछ बेचती हो उसे एक गुड़िया जरूर भेट करे एक छोटी सी गुड़िया से आप उसे संसार भर की खुशिया दे दोगे और मुझे कोई फिर मिल गया अगर बिना पैसो के गुड़िया ख़रीदा हुआ तो में उसे खुद से खरीद के दे दूंगा गुड़िया क्यों कि हज़ारो सपनो और उमीदो का भण्डार होती हैं “गुड़िया कि दुकान”  ………………………… उपेंद्र पंवार

गुड़िया के बारे कुछ विचारो को जाना

(अनुराधा)

रायपुर निवासी अनुराधा ने बताया है कि बचपन में जब वो गुड़िया से खेला करती थी तो अपने हाथो से गुड़िया के लिए कपडे सिया करती थी, सर्दियों के समय उनके लिए गर्म स्वेटर बनाया करती थी, उनकी गुड़िया ही उनकी इकलौती खिलौना हुवा करती थी उनकी पड़ोस में उनकी सहेली बहुत सुन्दर गुड़िया बनती थी।  आज भी अनुराधा बचपन के दिन को बहुत याद करती है।

(संस्कृति )

 

SGRR कर्णप्रयाग (चमोली) की 6 क्लास में पड़ने वाली संस्कृति ने बताया कि उसे कभी ये नहीं लगता कि उसकी गुड़िया के अंदर जान नहीं है हम अपनी गुड़िया कि कद्र , उसका ख्याल एक इंसान कि तरह ही रखते हैं उससे बाते करना उसको खुसी और दुःख बताना एक दोस्त कि तरह होती है गुड़िया। संस्कृति हमेशा गुड़िया से खेलना चाहती है|

(नेहा)

 

देहरादून निवासी नेहा ने बताया ” जिस तरह उस बच्ची के लिए वो गुड़िया जरुरु थी ठीक उसी तरह से उस बच्ची के पिता के लिए उसे खरीदना जरुरी था क्यों कि उस गुड़िया से जुडी थी भावनाये ” नेहा आगे बताती हैं कि कभी कुछ चीजे बहुत बड़ी नहीं होती पर सामने वाले के लिए उसका सारा संसार होती हैं|

(रिद्धिमा)

 

कक्षा ११ की छात्र रिद्धिमा ने बताया कि जब हम गुड़िया से खेलते थे  वो समय कितने जल्दी गुज़र गया पता ही नहीं चला , अब पढ़ाई का इतना बोझ है कि पुरानी गुड़िया को देखकर उनसे फर से खेलने को मन करता है काश वो दिन वापस पाते गुड़िया वाले  रिद्धिमा को जब भी समय लगता है वो अपनी पुरानी गुड़िया को जरूर हाथ में उठाती है।

    (डॉ0 सीमा रावत)

पेशे  से लुधियान में  डॉक्टर सीमा रावत का कहना है कि उनकी पिता का सबसे प्यारा उपहार जो था वो गुड़िया थी बहियत समय तक उस के साथ खेला अनगिनत यादे जोड़ी , आज कि दौड़ भाग कि जिंदगी में जब मुझे (सीमा को ) सकून चाहिए होता है तो वो उस गुड़िया को ही याद करती है।

    उपेंद्र पंवार (लेखक)

 

 

मेरा पहला प्रयास गुड़िया की दूकान उपेंद्र पंवार

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