कागज़ से पहले जहाँ लिखे गए वेद-पुराण
उत्तरकाशी/देहरादून: जब हम डिजिटल दुनिया में कागज़ और कंप्यूटर स्क्रीन पर इतिहास लिख रहे हैं, तब उत्तराखंड के हिमालय में एक ऐसी जगह आज भी मौजूद है जो हमें प्राचीन भारत के लेखन इतिहास से जोड़ती है। हम बात कर रहे हैं उत्तरकाशी जिले में स्थित ‘भोजबासा‘ (Bhojbasa) की। पवित्र गंगोत्री धाम से गौमुख ग्लेशियर (गंगा नदी का उद्गम स्थल) की ओर बढ़ने वाले ट्रैकर्स और श्रद्धालुओं के लिए यह घाटी सिर्फ एक ठहराव नहीं, बल्कि रहस्यों और प्राकृतिक खूबसूरती का अद्भुत खजाना है।
क्यों पड़ा इसका नाम ‘भोजबासा‘?
समुद्र तल से लगभग 12,400 फीट (3,775 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित इस शांत घाटी का नाम यहाँ पाए जाने वाले ‘भोजपत्र’ (Bhojpatra) के पेड़ों के कारण पड़ा है। प्राचीन काल में जब आधुनिक कागज़ का आविष्कार नहीं हुआ था, तब हमारे ऋषि-मुनि इसी पेड़ की सफेद छाल (Bark) का उपयोग ग्रंथ, वेद और शास्त्र लिखने के लिए करते थे। स्थानीय भाषा में ‘बासा’ का अर्थ ‘बगीचा’ या ‘रहने का स्थान’ होता है। इस क्षेत्र में भोजपत्र के पेड़ों का घना जंगल होने के कारण इसे ‘भोजबासा‘ कहा जाने लगा।
गौमुख ट्रेक का अंतिम और सबसे अहम पड़ाव
गंगोत्री से शुरू होने वाले 14 किलोमीटर के पैदल और उबड़-खाबड़ रास्ते को पार करने के बाद भोजबासा आता है। गौमुख ग्लेशियर यहाँ से मात्र 5 किलोमीटर आगे रह जाता है। यह इस पूरे रूट पर यात्रियों के रात्रि विश्राम (नाइट हॉल्ट) के लिए एकमात्र मुख्य स्थान है। यहाँ पर गढ़वाल मंडल विकास निगम (GMVN) का एक गेस्ट हाउस और टेंट कॉलोनी मौजूद है, जहाँ ट्रेकर्स रुकते हैं। इसके साथ ही यहाँ का प्रसिद्ध ‘लालबाबा आश्रम’ सालों से यात्रियों को आश्रय और भोजन दे रहा है।
भागीरथी चोटियों का सम्मोहक नज़ारा और दुर्लभ वन्यजीव
भोजबासा पहुँचते ही आँखों के सामने हिमालय की गगनचुंबी भागीरथी सिस्टर्स (चोटियाँ) और पवित्र शिवलिंग पर्वत दिखाई देने लगते हैं। कलकल बहती भागीरथी (गंगा) नदी के किनारे बसी यह घाटी पूरी तरह से शांत और बंजर पहाड़ों से घिरी है। यहाँ पेड़-पौधे बहुत कम हैं, लेकिन भाग्यशाली पर्यटकों को यहाँ बर्फीले तेंदुए (Snow Leopard), भालू और हिमालयी नीली भेड़ (Blue Sheep/भरल) जैसे दुर्लभ वन्यजीव आसानी से विचरते हुए दिख जाते हैं।
रोमांच के साथ चुनौतियाँ भी हैं बड़ी
चिरबासा से भोजबासा के बीच का रास्ता बेहद संवेदनशील है, जहाँ अक्सर पहाड़ों से ढीले पत्थर गिरते हैं (Landslide Zone)। हाल ही में सितंबर के अंत में खराब मौसम के कारण यहाँ कई ट्रैकर्स फंस गए थे, जिन्हें जिला प्रशासन और एसडीआरएफ (SDRF) की टीमों ने रेस्क्यू कर सुरक्षित निकाला था। अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण यहाँ ऑक्सीजन की कमी और हाड़ कंपाने वाली ठंड का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद, यहाँ की शांति और आध्यात्मिकता हर साल हजारों एडवेंचर प्रेमियों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती है।

