7 July 2026

PCO की ‘मौन’ विदाई

आज की पीढ़ी के लिए हर हाथ में स्मार्टफोन और मुफ्त इंटरनेट एक सामान्य बात है। लेकिन 90 के दशक और 2000 की शुरुआत के भारत को याद करें। तब गली-कूचों में चमकने वाले पीले और नीले रंग के ‘STD/ISD/PCO’ के साइनबोर्ड ही अपनों से जुड़ने का इकलौता जरिया हुआ करते थे। आज मोबाइल फोन के सर्वव्यापी विस्तार ने इन PCO बूथों को हमारे बीच से पूरी तरह गायब कर दिया है।
 जब सिक्का गिरते ही शुरू होती थी बात
वो भी क्या दौर था, जब जेब में रखे एक रुपये के सिक्के की कीमत आज के अनलिमिटेड रिचार्ज से कहीं ज्यादा महसूस होती थी।
  • लंबी कतारें: त्योहारों या संडे के दिन PCO बूथ के बाहर लोगों की लंबी लाइनें लगती थीं।
  • दिल की धड़कनें: लाल रंग के डिजिटल मीटर पर बढ़ती हुई पल्स और पैसे देखकर दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं।
  • रोजगार का जरिया: ये बूथ केवल बातचीत का माध्यम नहीं थे, बल्कि लाखों दिव्यांगों और छोटे व्यापारियों के रोजगार का सहारा थे।
 मोबाइल क्रांति ने बदला परिदृश्य
साल 2000 के बाद देश में मोबाइल फोन और सस्ते कॉलिंग टैरिफ का दौर शुरू हुआ। इसके बाद रही-सही कसर 4G और 5G इंटरनेट क्रांति ने पूरी कर दी।
  • घर-घर पहुंचे फोन: अब बातचीत के लिए घर से बाहर जाने की जरूरत नहीं रही।
  • सस्ती कॉलिंग: वॉयस कॉल लगभग मुफ्त हो गई और वीडियो कॉल का जमाना आ गया।
  • बंद हुए शटर: कॉल रेट्स इतने गिरे कि PCO बूथ चलाना घाटे का सौदा बन गया और धीरे-धीरे इन दुकानों पर ताले लग गए।
 समय के साथ बदला रूप
जो PCO बूथ कभी सिर्फ फोन मिलाने के काम आते थे, उनमें से कई ने वक्त के साथ खुद को बदल लिया। आज वो दुकानें या तो मोबाइल रिचार्ज और एसेसरीज की दुकान बन चुकी हैं, या फिर किराना और साइबर कैफे में तब्दील हो गई हैं।
निष्कर्ष:
तकनीक की रफ्तार ने हमें सहूलियत तो बहुत दी है, लेकिन PCO बूथ के बाहर खड़े होकर अपनों की आवाज सुनने का जो रोमांच और सब्र था, वो आज के ‘इंस्टेंट’ दौर में कहीं खो गया है। PCO बूथ भले ही अब सड़कों से गायब हो चुके हैं, लेकिन भारतीय संचार क्रांति के इतिहास में उनका नाम हमेशा सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगा।
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