बरसों से सूनी पड़ी चौपालें, खंडहर होते मकान और ‘घोस्ट विलेज’ का ठप्पा झेल रहे उत्तराखंड के पहाड़ों से एक सुखद खबर आ रही है। पलायन के दंश से कराहते देवभूमि की तस्वीर अब बदलने लगी है। ताजा आंकड़े गवाह हैं कि रिवर्स पलायन अब सिर्फ एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि धरातल पर उतरती हकीकत बन रहा है।

क्यों खाली हुए थे पहाड़? (दंश की दास्तां)
उत्तराखंड के गांव खाली होने के पीछे कोई एक वजह नहीं थी, बल्कि यह सिस्टम की नाकामी और मजबूरी का मिला-जुला असर था:
- इलाज के बिना दम तोड़ती सांसें: पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में आज भी ‘रेफर सेंटर’ के भरोसे चलती स्वास्थ्य सेवाएं लोगों को शहरों की ओर धकेलती रहीं।
- रोजगार का अकाल: हाथ में डिग्री तो थी, लेकिन पहाड़ में काम नहीं। मजबूरी में युवाओं को गुरुग्राम और मुंबई के होटलों में बर्तन मांजने या सिक्योरिटी गार्ड बनने के लिए घर छोड़ना पड़ा।
- खेती पर ‘वन्यजीवों’ का कब्जा: बंदरों और सुअरों के आतंक ने रही-कसर पूरी कर दी। किसान ने जब देखा कि फसल घर आने से पहले जंगली जानवर चट कर रहे हैं, तो उसने हल छोड़कर शहर की राह पकड़ ली।

अब क्या बदला? (बदलाव की बयार)
पलायन निवारण आयोग की हालिया रिपोर्ट एक नई उम्मीद जगाती है। उत्तराखंड के लगभग 6,300 प्रवासियों ने अपने घर वापसी की है।
- होम-स्टे बना गेम चेंजर: अब युवा शहर की 10-12 हजार की नौकरी छोड़कर अपने पुश्तैनी घर को ‘होम-स्टे’ में बदल रहे हैं। इससे न सिर्फ उन्हें रोजगार मिल रहा है, बल्कि पहाड़ की संस्कृति का भी प्रचार हो रहा है।
- पॉलीहाउस और कैश क्रॉप्स: पारंपरिक खेती की जगह अब सेब, कीवी और मशरूम की खेती ने युवाओं को लखपति बनने का रास्ता दिखाया है।
सरकार की ‘घेराबंदी’
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का ‘वाइब्रेंट विलेज’ मॉडल और ‘प्रवासी पंचायत’ जैसे कदम सीधे तौर पर उन लोगों को टारगेट कर रहे हैं जो वापस आना चाहते हैं। सीमावर्ती गांवों को ‘पहला गांव’ मानकर वहां सड़क और इंटरनेट पहुंचाया जा रहा है।
बड़ा सवाल: क्या ये वापसी स्थायी होगी? जानकारों का मानना है कि अगर शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति को युद्ध स्तर पर नहीं सुधारा गया, तो यह ‘रिवर्स पलायन’ फिर से ‘पलायन’ में बदल सकता है।
