4 August 2026

जहाँ पत्थरों में बसते हैं महादेव

अल्मोड़ा: देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में स्थित जागेश्वर धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और वास्तुकला का जीता-जागता संग्रहालय है। समुद्र तल से लगभग 1870 मीटर की ऊँचाई पर घने देवदार के जंगलों के बीच स्थित यह धाम भगवान शिव के ‘नागेशं दारुकावने’ ज्योतिर्लिंग के रूप में विख्यात है।
124 मंदिरों का अद्भुत समूह
जागेश्वर धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थित 124 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है। जटागंगा नदी के किनारे स्थित इन मंदिरों का निर्माण 7वीं से 14वीं शताब्दी के बीच कत्यूरी और चंद राजाओं द्वारा करवाया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, यहाँ के मंदिर नागर शैली में बने हैं, जो अपनी बेजोड़ नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।
शिवलिंग पूजा का केंद्र और पौराणिक मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जागेश्वर ही वह स्थान है जहाँ से पूरे विश्व में ‘शिवलिंग की पूजा’ की शुरुआत हुई थी। पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि भगवान शिव ने यहाँ के ‘दारुकावन’ (देवदार के जंगल) में तपस्या की थी। यहाँ स्थित महामृत्युंजय मंदिर को पूरे परिसर का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है, जहाँ महामृत्युंजय मंत्र के जाप का विशेष महत्व है। उत्तराखंड पर्यटन
सावन में उमड़ता है आस्था का सैलाब
हर साल सावन के महीने में यहाँ भव्य ‘श्रावणी मेले’ का आयोजन किया जाता है। स्थानीय निवासियों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु यहाँ भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि जागेश्वर धाम में मांगी गई मन्नतें कभी खाली नहीं जातीं, यही कारण है कि इसे कुमाऊं के लोगों की अगाध श्रद्धा का केंद्र माना जाता है।
पर्यटन और संरक्षण की राह
वर्तमान में, यह परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में है। सरकार इसे ‘मानसखंड मंदिर माला मिशन’ के तहत विकसित कर रही है, जिससे यहाँ पर्यटन सुविधाओं में निरंतर सुधार हो रहा है। यात्रियों के लिए यहाँ डिजिटल गाइड और एक शानदार संग्रहालय भी उपलब्ध है, जहाँ प्राचीन मूर्तियों को सहेज कर रखा गया है।

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