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टिहरी जाये तो सिंगोरी खाना और लाना ना भूले -

सिंगोरी: उत्तराखंड की अनोखी स्वाद यात्रा

उत्तराखंड के महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने 80 के दशक में टिहरी डैम पर एक गाना बनाया था जिसमे उन्होंने बड़ा ही मार्मिक वर्णन करते हुए बताया था की टिहरी शहर के डूब जाने के बाद हम क्या – क्या खो देंगे | उसमे उन्होंने एक मिठाई का भी जिक्र किया है जिसका नाम है “सिंगोरी”
सिंगोरी प्राचीन काल से ही टिहरी की पहचान बनीं हुई है, आइये आज सिंगोरी के बारे में जानते हैं

उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों के बीच छिपी, सिंगोरी एक ऐसी मिठाई है जो सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि परंपरा और प्रकृति का अनूठा संगम भी है। यह केवल एक पकवान नहीं, बल्कि पर्वतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, जिसे अक्सर त्योहारों और विशेष अवसरों पर बनाया जाता है।

सिंगोरी क्या है?

सिंगोड़ी मुख्य रूप से खोये (मावा) से बनने वाली एक पारंपरिक मिठाई है। इसे चीनी और इलायची के साथ मिलाकर बनाया जाता है, लेकिन इसकी असली पहचान इसे लपेटने के तरीके से आती है। सिंगोड़ी को खास मालू के पत्तों (Bauhinia variegata) में लपेटा जाता है, जो हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ये पत्ते ही सिंगोड़ी को इसकी विशिष्ट खुशबू और हल्का कसैला स्वाद देते हैं, जो इसे अन्य मिठाइयों से अलग बनाता है।

इसकी खासियत मालू के पत्तों का उपयोग सिंगोड़ी को एक प्राकृतिक और सुगंधित आवरण देता है। इन पत्तों के कारण ही सिंगोड़ी को एक खास मिट्टी जैसी सुगंध और स्वाद मिलता है, जो इसे और भी खास बना देता है। सिंगोड़ी बनाने में खोया, चीनी और इलायची जैसी साधारण सामग्री का उपयोग होता है, लेकिन जब ये मालू के पत्तों के साथ मिलते हैं, तो एक असाधारण स्वाद का अनुभव होता है। उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊं क्षेत्र (जैसे अल्मोड़ा) में, सिंगोड़ी का सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है। यह मेहमानों के स्वागत में या धार्मिक अनुष्ठानों के बाद प्रसाद के रूप में भी परोसी जाती है।

कैसे बनती है सिंगोरी ?

 सबसे पहले दूध को गाढ़ा करके खोया तैयार किया जाता है। फिर इस खोये को चीनी और इलायची पाउडर के साथ धीमी आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक यह गाढ़ा न हो जाए और हल्का सुनहरा रंग न ले ले। इसके बाद, इस मिश्रण को थोड़ा ठंडा करके छोटे-छोटे शंकु के आकार में ढाला जाता है और फिर प्रत्येक को सावधानी से एक ताजे मालू के पत्ते में लपेट दिया जाता है।

सिंगोड़ी सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता और पारंपरिक कारीगरी का प्रतीक है। इसे चखना उस क्षेत्र की संस्कृति और उसके शांत वातावरण का अनुभव करने जैसा है।

इसको लिखते लिखते मेरे मुँह में तो पानी आ गया और आपके………?

“उपेंद्र पंवार”

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