11 October 2026

क्यों पहाड़ों की मुंडेरों पर आज भी रोती है ‘घिनुड़ी’

उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों और पारंपरिक जनजीवन में प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता हमेशा से बेहद आत्मीय रहा है। यहाँ के आंगनों में फुदकने वाली छोटी सी घरेलू गौरैया, जिसे स्थानीय भाषा में प्यार से ‘घिनुड़ी’ (या घिंदुड़ी) कहा जाता है, केवल एक पक्षी नहीं बल्कि हमारी लोकसंस्कृति और भावनाओं का एक अहम हिस्सा है। इस प्यारी सी चिड़िया से जुड़ी एक बेहद मार्मिक और पुरानी लोककथा उत्तराखंड के घर-घर में सुनाई जाती है, जो भाई-बहन के पवित्र प्रेम और पछतावे की एक अनूठी दास्तान है।


यह कहानी एक भाई और बहन की है। बहन की शादी दूर-दराज किसी दूसरे पहाड़ पार गाँव में हो चुकी थी। उत्तराखंड की संस्कृति में आज भी भाई अपनी विवाहित बहन के लिए मायके से ‘भिटोली’ यानी उपहार और लोक-पकवान लेकर उसके ससुराल जाता है। वर्षों बीत जाने के बाद जब बहन मायके नहीं आ पाई, तो उसका छोटा भाई अपनी दीदी से मिलने और उसे भिटोली देने के लिए अकेले ही जंगलों, नदी और गदेरों को पार करते हुए लंबी यात्रा पर निकल पड़ा।


कई दिनों की कठिन और थका देने वाली पैदल यात्रा के बाद जब भाई आखिरकार अपनी बहन के घर पहुँचा, तो उस वक्त उसकी दीदी गहरी नींद में सो रही थी। पुरानी लोक-मान्यता के अनुसार सोते हुए व्यक्ति को अचानक जगाना उचित नहीं माना जाता था, इसलिए भाई ने सोचा कि वह थोड़ी देर विश्राम कर ले। लेकिन सफर की भारी थकान और लंबे रास्ते के संघर्ष के कारण भाई खुद भी अचेत सा हो गया।
जब कुछ देर बाद बहन की आँख खुली, तो उसने देखा कि उसका भाई उससे मिलने आया था और वह गहरी नींद में सोती रह गई। भाई वहाँ से वापस जा चुका था या अचेत अवस्था में था, और उसके द्वारा लाई गई भिटोली वहीं रखी थी। यह अहसास होते ही कि उसका भाई उससे मिलने इतनी दूर से भूखा-प्यासा आया और वह सोती ही रह गई, बहन का दिल बैठ गया। वह अपने इस अभाग्य और भाई के अथाह प्रेम को याद कर फूट-फूटकर रोने लगी।
प्रायश्चित्त और विरह की उस आग में तड़पते हुए उसके मुंह से बार-बार यही शब्द निकले— ‘घुघुती! भै भूखू, मैं सूती’ यानी मेरा भाई भूखा रह गया और मैं सोती रही। इसी तीव्र व्यथा और भाई के प्रेम में विह्वल होकर उसने प्राण त्याग दिए। लोक-मान्यता है कि वही बहन आगे चलकर ‘घिनुड़ी’ या ‘घुघूती’ पक्षी के रूप में इस धरती पर अमर हो गई।
आज भी जब पहाड़ों के घरों की मुंडेरों पर यह छोटी सी चिड़िया फुदकती है और अपनी मीठी आवाज निकालती है, तो बुजुर्गों को यह लोककथा और पहाड़ों का वह सहज, निश्छल और अपनापन से भरा अतीत याद आ जाता है। यह कथा सिर्फ एक पक्षी के जन्म की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक संवेदना का प्रतीक है जो हमारे रिश्तों को आज भी जीवंत रखे हुए है।

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