हिमालय का दिव्य चमत्कार उत्तराखंड का राज्य पुष्प ‘ब्रह्मकमल’
देहरादून/चमोली: उत्तराखंड, जिसे हम ‘देवभूमि’ के नाम से जानते हैं, अपने आंचल में कई प्राकृतिक और आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है। इन्हीं अनमोल धरोहरों में से एक है ब्रह्मकमल (Brahma Kamal), जो उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। ‘हिमालयी फूलों का सम्राट’ कहे जाने वाले इस दुर्लभ और दिव्य पुष्प का दीदार करना किसी सौभाग्य से कम नहीं माना जाता। आइए जानते हैं इस फूल से जुड़ी कुछ ऐसी बातें और इसका महत्व, जो इसे दुनिया के अन्य फूलों से बिल्कुल अलग बनाते हैं।
क्यों खास है ब्रह्मकमल? (वैज्ञानिक व भौगोलिक तथ्य)
- वैज्ञानिक नाम: इसका वैज्ञानिक नाम सौसूरिया अब्वेलेटा (Saussurea obvallata) है और यह ‘एस्टेरेसी’ (Asteraceae) परिवार से संबंध रखता है।
- दुर्लभ ऊंचाइयों पर वास: यह फूल आम मैदानों में नहीं, बल्कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 3,000 से 5,000 मीटर (करीब 11,000 से 17,000 फीट) की दुर्गम ऊंचाइयों पर, चट्टानों और घास के मैदानों (बुग्यालों) में उगता है।
- प्रमुख क्षेत्र: उत्तराखंड में यह मुख्य रूप से फूलों की घाटी (Valley of Flowers), हेमकुंड साहिब, केदारनाथ, बद्रीनाथ, रूपकुंड और पिंडारी ग्लेशियर जैसे क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तराखंड में इसकी 24 से 28 प्रजातियां और पूरे विश्व में लगभग 210 प्रजातियां पाई जाती हैं।
- खिलने का अनोखा समय:
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. उत्तराखंड में इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्वउत्तराखंड की संस्कृति और आस्था में ब्रह्मकमल का स्थान सर्वोच्च है:
- देवताओं का प्रिय पुष्प: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पुष्प की उत्पत्ति स्वयं सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी के नाम पर हुई है। यह माता नंदा देवी का सबसे प्रिय पुष्प माना जाता है, इसलिए नंदा अष्टमी के पावन अवसर पर इसे विशेष रूप से तोड़ा जाता है।
- चारधाम पूजा का मुख्य हिस्सा: केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में भगवान शिव और भगवान विष्णु को यह दिव्य फूल प्रसाद और मुख्य भेंट के रूप में अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु इसे भगवान का विशेष आशीर्वाद मानते हैं।
- महाभारत में उल्लेख: धार्मिक ग्रंथों और महाभारत के वन पर्व में इसे ‘सौगंधिक पुष्प’ कहा गया है, जिसे लाने के लिए द्रौपदी ने भीम से अनुरोध किया था।
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औषधीय गुणों का खजाना


