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हैंवल घाटी में रिवर्स पलायन की वजह जाने उत्तराखण्ड पलायन के लिए बेहतरीन उदाहरण -

ऋषिकेश से 40 किलोमीटर दूर हैंवल घाटी में कई वर्षों से किसान अदरक की खेती करते आ रहे हैं। यहां पर किसान आज भी परंपरागत तरीके से ही अदरक उगा रहे हैं।

आगराखाल यहां का करीबी बाजार है इसलिए आगराखाल का अदरक नाम से ही यहां का अदरक प्रशि़द्ध है। लगभग दो दशक पहले तक यहां पर अदरक की पैदावार अत्यधिक थी, साथ ही गुणवत्ता में भी यहां का अदरक अपनी विशेष पहचान रखता था।हैंवल घाटी में 20 से अधिक गांव हैं। इन गांवों के लगभग सभी परिवार अदरक की खेती करते थे और अदरक पर ही इन परिवारों की आर्थिकी निर्भर थी। एक गांव में 100 कुंतल से अधिक अदरक का उत्पादन होता था। इसे बाजार में बेचकर गांव के किसानों का साल भर का खर्च निकल जाता था। लेकिन धीरे धीरे इन गांवों की अदरक की खेती में सोफ्ट रोट नाम की बीमारी लगनी शुरू हुई, जिससे अदरक की जड़ें सड़ने लगी, इसकी गुणवत्ता गिरने लगी और उत्पादन भी बहुत कम हो गया। परिणाम स्वरूप कुछ किसान वैकल्पिक फसलें उगाने लगे, कुछ गांवों से निकलकर शहर की ओर बसने लगे।हेंवल घाटी का उदखंडा गाँव पलायन के चलते वीरान हो चुका था, जहां अब रिवर्स पलायन की पहल शुरू हो चुकी है. गाँव में स्थापित तकनीकी संसाधन केंद्र ने किसानों के लिए रोजगार के कई रास्ते खोल दिए हैं, पहले गाँव की एक सहकारिता का गठन किया गया और फिर सहकारिता के माध्यम से गाँव के बंजर हो चुके खेतों को सिंचित कर कृषि योग्य बनाया. इन खेतों में बड़ी मात्रा में अदरक का उत्पादन किया गया. आंचल पर्वतीय विकास चेतना केंद ने यूकोस्ट के सहयोग से गाँव में तकनीकी संसाधन केंद्र की स्थापना की, जहां पर किसान अपने स्थानीय कृषि उत्पादन से अदरक का पाउडर, सौंठ, अचार, माल्टा का श्क्वैश, आंवला का अचार आदि उत्पाद बना रहे हैं. साथ ही यह सभी उत्पाद एफएसएसएआइ प्रमाणित हैं। इससे गाँव की महिलाओं और किसानों को रोजगार के कारण कई अवसर मिल रहे हैं. पलायन का एक और कारण गांव का सड़क से मीलों दूर होना था और साथ ही यहां पर परंपरागत खेती के अलावा रोजगार का अन्य कोई साधन नहीं था। कभी 100 परिवारों के उदखंडा गांव में मात्र 4 परिवार ही रह गए थे और वे भी गांव छोड़ने की तैयारी कर रहे थे। इस ग्रामसभा का अस्तित्व खत्म होने जा रहा था और यह घोस्ट विलेज की कगार पर पंहुच गया था।संस्था ने गांव की बंजर हो चुकी कृषि भूमि को सहकारिता से जोड़ा और पहले चरण में गांव की लगभग चार हैक्टेयर जमीन को सुधार कर उसे सिंचित कर पुनः कृषि योग्य बनाया। अब तक दस हैक्टेयर जमीन को सुधार कर कृषि योग्य बनाई जा चुकी है और कई छतिग्रस्त जल श्रोतों व पानी के टैंकों की मरम्मत कर उन्हें पुनर्जीवित किया जा चुका है।

आंचल संस्था ने पांच गांवों चैंपा, पिपलेथ, जाजल, कुमाली और उदखंडा में किसानों के समूह बनाए हैं। प्रत्येक गांव में 20 किसानों का एक समूह है। इस प्रकार से पांच गावों के 100 किसानों को मिलाकर एक सहकारिता बनायी गयी है। अदरक के बीज को बीमारी मुक्त करने का कार्य कृषि विज्ञान केंद्र रानीचैरी के दिशा निर्देशन में किया गया और साथ ही बीज के लिए रखे गए अदरक के भंडारण में भी वैज्ञानिक विधि अपनाई गई। अदरक के उत्पादन पर किए गये सफल प्रयोग के उपरांत अब संस्था काली हल्दी के उत्पादन पर काम कर रही है। काली हल्दी की मैडिकल वैल्यू काफी हाई है जिससे किसानों को अत्यधिक लाभ होने की संभावना है।आंचल संस्था द्वारा गांव की सहकारिता को आर्थिक रूप से मजबूत किए जाने हेतु तकनीकी संसाधन केंद्र के माध्यम से यह एक नवाचार विधि अपनाई गयी है। केंद्र में खाद्य प्रसंस्करण की आधुनिक मशीने जैसे पाउडर ग्राइंडर, डिहाइड्रेटर, जूसर मिक्सर आदि मशीनें यूकोस्ट द्वारा दी गई। संस्था स्थानीय ग्रामीणों को संगठित कर उनके उत्पादन का प्रसंस्करण उन्हें उत्पाद में बदलने का काम कर रही है। साथ ही इन उत्पादों को बाजार में उतारे जाने के लिए सहकारिता को सहयोग कर रही है। सहकारिता को इससे लाखों का मुनाफा हो रहा है आर्थिक रूप से मजबूत हो रही है साथ ही गांव के युवा व महिलाएं रोजगार से जुड़ रही हैं।
खेती के अलावा इस गांव में पर्यटन पर भी बहुत तेजी के साथ काम हो रहा है यहां पर भाई विनोद कोठियाल ने पर्यटन पर काम करना शुरू कर दिया है और इन्होंने यहां गांव में लगभग तीन सुंदर कॉटेज बनाई है जहां पर आप ट्रैकिंग बर्ड वाचिंग आदि का भी आप आनंद उठा सकते हैं
कैसे पहुंचे – ऋषिकेश से मात्र गंगोत्री हाइवे पर एक छोटा सा मार्किट आएगा खाड़ी । और खाड़ी से मात्र आधे घंटे के सफर के बाद आप इस खूबसूरत गांव पहुंच सकते हैं। और यहां आप हिमालय दर्शन होम स्टे में रुककर ट्रैकिंग वाइल्डलाइफ बर्ड वाचिंग और गांव के सुंदर वातावरण का आनंद उठा सकते हैं

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(लेख हेतु विशेष आभार श्री विजय नेगी जी का )

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