दादा के बाद पोता बना ‘राम’: 100 सालों से जारी है रामलीला की यह अनकही पारिवारिक धरोहर

विशेष रिपोर्ट | डिजिटल डेस्क
देहरादून/उत्तर भारत:
शरद ऋतु की दस्तक के साथ ही पूरे देश में रामलीला का सुरम्य उत्सव शुरू हो चुका है। शाम ढलते ही लाउडस्पीकर पर गूंजती चौपाइयाँ, ढोलक की थाप और ‘जय श्री राम’ के जयघोष वातावरण को भक्तिमय बना रहे हैं। लेकिन इस जगमगाती रोशनी और मंचन के पीछे एक ऐसी अनकही कहानी है, जो सीधे हमारी जड़ों, परम्पराओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है।
आज हम जिस रामलीला को देख रहे हैं, उनमें से कई समितियां और नाटक मंडलियां 100 साल से भी अधिक पुरानी हैं। सदियाँ बदल गईं, दौर बदल गए, लेकिन रामलीला कराने का यह संकल्प आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदस्तूर जारी है।

बदल गए पात्र, बदल गए किरदार; नहीं बदला तो बस संकल्प
यदि आप किसी 80 या 100 साल पुरानी रामलीला समिति के इतिहास पर नज़र डालें, तो आपको अहसास होगा कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक ‘पारिवारिक एवं सामाजिक धरोहर’ है।
* एक ही परिवार की कई पीढ़ियाँ: जिस मंच पर कभी दादा जी ने ‘दशरथ’ या ‘जनक’ का किरदार निभाया था, उसी मंच पर आज उनका पोता ‘श्री राम’ या ‘लक्ष्मण’ की भूमिका में नज़र आता है।
* बदलती तकनीक, कायम सादगी: किसी ज़माने में जहाँ पेट्रोमैक्स (गैस की बत्ती) और साधारण परदों के बीच संवाद बोले जाते थे, आज वहाँ हाई-टेक साउंड सिस्टम, एलईडी स्क्रीन और डिजिटल इफ़ेक्ट्स ने जगह ले ली है।
* कलाकारों का परिवर्तन: संवाद अदायगी का अंदाज़ बदला है, चेहरे बदले हैं, और निर्देशन के तरीके भी आधुनिक हुए हैं—लेकिन रामकथा का मूल संदेश और कलाकारों का समर्पण आज भी शताब्दी पूर्व जैसा ही पवित्र है।
पीढ़ी की विरासत: दादा से पिता, और अब बच्चों के हाथों में कमान
पुरानी रामलीला समितियों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इनका संचालन किसी व्यावसायिक कंपनी के हाथ में नहीं, बल्कि स्थानीय परिवारों और समुदाय के पास है।
बुजुर्ग बताते हैं कि दशकों पहले उनके पूर्वजों ने चंदा इकट्ठा करके, झोपड़ियों और कच्चे मैदानों से जिस रामलीला की शुरुआत की थी, आज उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी उसे एक वटवृक्ष की तरह सींच रही है। युवा पीढ़ी भले ही कॉर्पोरेट नौकरियों, आईटी सेक्टर या अन्य पेशों में व्यस्त हो, लेकिन आश्विन (कुआर) का महीना आते ही वे सब कुछ छोड़कर अपनी रामलीला समिति की सेवा में जुट जाते हैं।
> “हमारे परदादा जी ने जब इस कमेटी की नींव रखी थी, तब संसाधन नहीं थे पर भाव पूरा था। आज हमारे पास आधुनिक मंच है, लेकिन हम आज भी उन्हीं के बताए नियमों और निष्ठा का पालन करते हैं।”
> — एक ऐतिहासिक रामलीला समिति के युवा आयोजक
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आधुनिकता के दौर में भी प्रासंगिक है यह धरोहर
सोशल मीडिया और रील्स के इस डिजिटल युग में, जहाँ लोगों का अटेंशन स्पैन (ध्यान केंद्रित करने का समय) कम होता जा रहा है, वहाँ रात-रात भर बैठकर रामलीला देखना अपने आप में एक मिसाल है। यह साबित करता है कि रामलीला सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी भावी पीढ़ी को मर्यादा, संस्कार, त्याग और सत्य की विजय का पाठ पढ़ाने वाली सबसे बड़ी पाठशाला है।
शत-प्रतिशत बदलावों के बावजूद, रामलीला समितियों का यह अटूट निरंतर प्रवाह (Continuity) इस बात का प्रमाण है कि “पात्र बदल सकते हैं, लेकिन रामकथा अजर-अमर है।”
संपादकीय टिप्पणी:
इस रामलीला सीज़न में जब भी आप अपने शहर या गाँव के रंगमंच पर प्रभु श्री राम के जीवन की लीला देखें, तो एक पल के लिए उन महान पूर्वजों और वर्तमान समितियों को भी नमन करें, जिन्होंने 100 सालों से इस अमूल्य धरोहर को सहेजकर हम तक पहुँचाया है।
