पानी में डूबा है 129 साल पुराना घंटाघर, फिर भी बाल न बांका हुआ
पुरानी टिहरी का ऐतिहासिक घंटाघर आज भी अपनी अनूठी वास्तुकला और ऐतिहासिक विरासत के कारण मीडिया पोर्टल्स के लिए एक बेहतरीन और दिलचस्प न्यूज़ स्टोरी (News Story) का विषय है। न्यूज़ पोर्टल के लिए इस धरोहर से जुड़े कुछ ऐसे मुख्य और सनसनीखेज फैक्ट्स नीचे दिए गए हैं, जिन्हें हेडलाइंस और बुलेट्स के साथ एक शानदार समाचार का रूप दिया जा सकता है
- लंदन की तर्ज पर निर्माण: इस ऐतिहासिक घंटाघर का निर्माण साल 1897 में टिहरी रियासत के तत्कालीन महाराज कीर्ति शाह ने करवाया था। इसे ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के ‘डायमंड जुबली’ (राज्यारोहण के 60 वर्ष) के सम्मान में लंदन के एक मशहूर घंटाघर की डिजाइन पर बनाया गया था।
- 3 साल का समय और 110 फीट ऊंचाई: 110 फीट ऊंचे इस भव्य टावर को पूरी तरह तैयार करने में कारीगरों को 3 साल का लंबा समय लगा था। यह पुरानी टिहरी के मुख्य चौक (टाउन स्क्वायर) की सबसे बड़ी पहचान था।
- सीमेंट नहीं, ‘उड़द की दाल’ का चमत्कार: इस न्यूज़ का सबसे बड़ा कैच पॉइंट (USP) यह है कि इसके निर्माण में किसी आधुनिक सीमेंट या प्लास्टर का इस्तेमाल नहीं हुआ था। इसे पत्थरों और उड़द की दाल के विशेष लेप (पारंपरिक गारा) से जोड़ा गया था। यही वजह है कि इसकी दीवारें इतनी अभेद्य और वॉटरप्रूफ बनीं।
- 2005 में जलसमाधि और आज भी सुरक्षित: साल 2005 में जब एशिया के विशालकाय टिहरी बांध की झील भरी गई, तो पूरा पुरानी टिहरी शहर पानी में समा गया। दो दशकों से भी अधिक समय तक पानी के भीतर लगातार डूबे रहने के बावजूद यह ढांचा आज भी पूरी मजबूती से खड़ा है।

- जलस्तर कम होते ही उमड़ती है भीड़: सर्दियों या गर्मियों के मौसम में जब भी टिहरी झील का वाटर लेवल कम होता है, तो इस घंटाघर का ऊपरी सिरा पानी से बाहर आ जाता है। इस नजारे को देखने और पुरानी यादों को ताजा करने के लिए झील के किनारे आज भी स्थानीय लोगों और पर्यटकों का हुजूम उमड़ पड़ता है।
- नई टिहरी में बनी इसकी ‘रेप्लिका’: पुरानी टिहरी के डूबने के बाद, इस ऐतिहासिक धरोहर की याद को जीवित रखने के लिए नई टिहरी के बौराड़ी में ठीक ऐसा ही एक हूबहू घंटाघर (प्रतिकृति) बनाया गया है। ( photo from Google )

