12 July 2026

वो सफर चार किलोमीटर …… PART -2

 

​PART-2: स्काई बैंक की कॉल और अधूरी दास्ताँ

​तीन साल बीत चुके थे। वह ४ किलोमीटर का सफर दीपक की यादों के किसी कोने में एक खूबसूरत ख्वाब की तरह दफन था। दीपक अब एक दूसरे शहर में शिफ्ट हो चुका था और अपने काम में मसरूफ था।

​एक दोपहर, दीपक के फोन की घंटी बजी। उसने अजीब सी थकावट के साथ फोन उठाया, “हेलो?”

​सामने से एक बेहद शालीन और जानी-पहचानी सी लड़की की आवाज़ आई, “हेलो, क्या मैं मिस्टर दीपक से बात कर रही हूँ?”

​”हाँ, जी मैं दीपक बोल रहा हूँ।”

​”जी, मैं नैना बात कर रही हूँ…”

​’नैना’ शब्द कानों में पड़ते ही दीपक के हाथ जैसे सुन्न हो गए। उसके दिमाग में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गई कि नैना आगे जो कुछ भी बोल रही थी—लोन, डॉक्यूमेंट्स, ब्याज दरें—दीपक को कुछ सुनाई ही नहीं दिया। उसे बस कार का वो रियर-व्यू मिरर, वो घबराई हुई आँखें और वो सुबह याद आने लगी।

​जब सामने से आवाज़ आई, “हेलो? दीपक जी, आप सुन रहे हैं?” तब उसने खुद को संभाला और लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “अह… हाँ, जी। माफ़ कीजिएगा, कौन नैना?”

​”जी, मैं स्काई बैंक से बात कर रही हूँ। आपने जो होम लोन के लिए अप्लाई किया था, मैं उसी के वेरिफिकेशन के लिए…”

​दीपक ने राहत की साँस ली और मुस्कुरा दिया। उसने कहा, “जी-जी, बताइए।” उस दिन बातचीत सिर्फ लोन तक सीमित रही, लेकिन दीपक का दिल गवाही दे रहा था कि यह आवाज़ वही है। अगले दो-तीन दिनों में ऑफिशियल काम के सिलसिले में नैना के दो-तीन कॉल और आए।

​काम पूरा होने के बाद, दीपक ने हिम्मत जुटाई और नैना का नंबर अपने फोन में सेव कर लिया। जैसे ही उसने वॉट्सऐप खोला और नैना की प्रोफाइल पिक्चर (DP) देखी, उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा! वही चुलबुली मुस्कान, वही सादगी।

​दीपक ने बिना देर किए चैट पर अपनी एक तस्वीर और साथ में अपनी उसी पुरानी कार की फोटो भेजी, और नीचे लिखा—क्या आपको शहीद चौक और ये कार याद है?”

​कुछ मिनटों बाद उधर से रिप्लाई आया—ओह माय गॉड! आप वही ‘STOP’ वाले खडूस ड्राइवर हैं जिसने मुझे लिफ्ट दी थी?!!”

​इसके बाद बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो थमा नहीं। नैना आज भी उतनी ही चुलबुली और जिंदादिल थी। इत्तेफाक देखिए कि नैना का ट्रांसफर भी उसी नए शहर में हुआ था जहाँ दीपक काम कर रहा था। दोनों ने मिलने का प्लान बनाया। जब वे मिले, तो ऐसा लगा ही नहीं कि वे अजनबी हैं। दोनों अक्सर मिलने लगे, कैफ़े जाने लगे, और पुरानी यादों को ताज़ा करने लगे। दीपक धीरे-धीरे नैना की हर छोटी आदत से प्यार करने लगा था—उसका बात-बात पर हंसना, उसकी चुलबुलाहट। नैना के दिल में भी दीपक के लिए एक बेहद सम्मानजनक और खास जगह बन चुकी थी। दीपक को लगने लगा था कि शायद किस्मत ने उस दिन कार का ब्रेक इसीलिए लगवाया था ताकि वे आज एक हो सकें।

वह मोड़… जहाँ सब बिखर गया (बिछड़ने का भावुक कारण)

​दीपक ने तय कर लिया था कि इस वीकेंड वह नैना को एक खूबसूरत सी जगह ले जाएगा और अपने दिल की बात कह देगा। वह अब और देर नहीं करना चाहता था।

​शनिवार की शाम, दीपक अपनी कार लेकर नैना को पिक करने उसके फ्लैट के नीचे पहुँचा। नैना नीचे आई, वह हमेशा की तरह बहुत प्यारी लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में वो पुरानी चुलबुलाहट नहीं थी। वो थोड़ी शांत और गंभीर थी।

​कार में बैठते ही नैना ने कहा, “दीपक, आज कहीं दूर चलें? जहाँ सन्नाटा हो।”

​दीपक ने गाड़ी शहर से दूर एक शांत पहाड़ी रास्ते की तरफ मोड़ दी। रास्ते भर नैना चुप रही और खिड़की से बाहर देखती रही। गाड़ी रोकने के बाद, दोनों कार से नीचे उतरे। ठंडी हवा चल रही थी।

दीपक: “नैना, तुम अचानक कहाँ गायब हो गई थीं? और इस नए शहर में आने की क्या वजह है?”

नैना: “मैं सिर्फ़ 3 महीने की ट्रेनिंग के लिए ‘उन्नत नगर’ वाले ऑफिस में थी। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद मुझे यहाँ आना ही था। मैं तुम्हारे लिए रसगुल्ले का डिब्बा भी लाई थी, लेकिन उस दिन विवेक मेरे घर आ गया और मैं उसी के साथ ऑफिस निकल गई। अगले ही दिन मुझे यहाँ आना पड़ा। तुम्हारा फोन नंबर न होने के कारण मैं तुमसे संपर्क नहीं कर पाई।

(माहौल: शाम का धुंधलका है, पहाड़ी पर ठंडी हवा चल रही है, कार पास में खड़ी है।)

नैना: (दूर पहाड़ों की तरफ देखते हुए, एक फीकी मुस्कान के साथ)* “पता है दीपक… हर लड़की की तरह मेरा भी एक अधूरा ख्वाब था। एक बार… बस एक बार लाल जोड़े में सजकर किसी की दुल्हन बनने का।”

दीपक: (धड़कते दिल के साथ, हिम्मत जुटाकर) “ख्वाब तो बहुत खूबसूरत है नैना… तो फिर इसे अधूरा क्यों कह रही हो? तुम दुल्हन बन क्यों नहीं सकती? अगर… अगर कोई तुम्हें इसी पल अपनाने को तैयार हो तो?”

नैना:-(चौंक कर दीपक की तरफ देखती है, उसकी आँखों में अचरज है) “तुम… तुम ये क्या कह रहे हो दीपक?”

दीपक:- (अब और खुद को रोक नहीं पाता, वह कार की तरफ बढ़ता है) “मैं सच कह रहा हूँ नैना। तुम पूछ रही थी न कि मैंने बैंक से लोन क्यों लिया, कार क्यों नहीं बेची? क्योंकि ये सिर्फ एक गाड़ी नहीं है, ये पिछले ३ साल से मेरी साँसें संभाल कर खड़ी थी।

(दीपक कार के पिछले शीशे के पास जाता है और धूल हटाकर दिखाता है, जहाँ लिखा है— “Searching Naina”

दीपक:-(भारी आवाज़ में)* “३ साल से रोज़ उस चौक पर सिर्फ तुम्हारी तलाश में घूम रहा था। मैं तुमसे कहना चाहता था नैना… कि मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ।”

(नैना स्तब्ध रह जाती है। वह उस शीशे पर लिखे ‘Searching Naina’ को देखती है। उसे यकीन नहीं होता कि ३ साल से कोई उसके लिए इस कदर तड़प रहा था। दीपक के इस निस्वार्थ प्यार को देखकर नैना के भीतर का सारा बांध टूट जाता है। वह रोने लगती है। वह धीरे से कांपते हाथों से बैग से वो डिब्बी निकालती है, जिसमें उसने शादी की अंगूठी रखी है…)

नैना:(रोते हुए, कांपते हाथों से वो अंगूठी दीपक को दिखाने की कोशिश करती है) “तुम… तुम मुझसे इतना प्यार करते हो दीपक? काश… काश तुमने ये मुझे ३ साल पहले कह दिया होता…”

(तभी, अचानक नैना का हाथ बुरी तरह कांपने लगता है। उसकी उंगलियों में जैसे जान नहीं बचती। उसके हाथ से वो अंगूठी छूटकर नीचे पहाड़ी की मिट्टी में गिर जाती है। नैना का संतुलन बिगड़ता है और वह दीपक की बाहों में ढहने लगती है।)

दीपक:-(घबरे आकर उसे संभालते हुए) “नैना! क्या हुआ तुम्हें? तुम ऐसे कांप क्यों रही हो?”

नैना:- (दीपक की छाती पर सिर टिकाए हुए, बेहद कमजोर आवाज़ में मुस्कुराती है, उसकी आँखों से आंसू बह रहे हैं) “इसीलिए कहा दीपक… कि मैं अब किसी की दुल्हन नहीं बन सकती। जिस नैना को तुम ३ साल से इस कार के पीछे नाम लिखकर ढूंढ रहे थे न… वो नैना अब कुछ ही दिनों की मेहमान है। मुझे बोन मैरो है दीपक… डॉक्टर्स ने कह दिया है कि मेरे पास अब वक्त बहुत कम है।”

अगले हफ़्ते मुझे ताऊ जी USA ले जा रहे हैं इलाज के लिए। मैं बस इस हफ़्ते ही इंडिया में हूँ, फिर मैं हमेशा के लिए चली जाऊँगी, कभी लौट कर नहीं आऊँगी।”

एयरपोर्ट का वो भावुक पल

​दो दिन बाद, एयरपोर्ट का लाउंज आंसुओं और भारी सांसों से भरा हुआ था। इंटरनेशनल फ्लाइट की अंतिम घोषणा (Final Call) हो चुकी थी। नैना के कदम भारी थे, वह इमिग्रेशन काउंटर की तरफ बढ़ रही थी। उसके ताऊ जी आगे निकल चुके थे। नैना बार-बार पीछे मुड़कर दीपक को देख रही थी, जो कांच की दीवार के पीछे बेबस खड़ा था।

​जैसे ही नैना ने अपना आखिरी कदम आगे बढ़ाया, उसका सब्र टूट गया। वह पलटी, दौड़ती हुई बाहर आई और रोते हुए खुद को दीपक की बाहों में सौंप दिया। उसने दीपक को कसकर पकड़ लिया, जैसे वह अपनी बची-कुची ज़िंदगी को थाम रही हो।

​दीपक ने उसके आंसू पोंछे और पूरी शिद्दत से कहा, “नैना… चलो शादी कर लेते हैं।”

​नैना ने रोते हुए वीज़ा और पासपोर्ट की तरफ इशारा किया, “यह सब कैसे होगा दीपक? मेरे पास वक्त नहीं है, मेरा इलाज…”

​”तुम्हारा इलाज हम यहीं इंडिया के सबसे बड़े अस्पताल में कराएंगे। मैं अपनी पूरी जान लगा दूँगा, लेकिन तुम्हें कुछ होने नहीं दूँगा। और उसके बाद… मैं तुम्हें अपनी दुल्हन ज़रूर बनाऊँगा,” दीपक की आवाज़ में एक अजीब सा हौसला था।

अस्पताल का वो आखिरी कमरा

​दीपक नैना को लेकर देश के सबसे बड़े अस्पताल पहुँचा। कई दिनों तक डॉक्टरों की टीम ने प्रयास किया, लेकिन नैना की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई। एक सुबह डॉक्टर ने दीपक को केबिन में बुलाया और बेहद मायूसी से कहा, “आई एम सॉरी दीपक। उनके पास मुश्किल से दो दिन बचे हैं। हमें वेंटिलेटर की तैयारी करनी होगी।”

​दीपक का दिल टूट गया, लेकिन उसने खुद को संभाला। उसने डॉक्टर से कहा, “मुझे बस थोड़ा सा वक्त दीजिए। मुझे उसका एक आखिरी ख्वाब पूरा करना है।”

​तभी अचानक मॉनिटर की बीप तेज़ हो गई। नैना की पल्स गिरने लगी। डॉक्टर ने हड़बड़ा कर कहा, “एमरन्सी है! इनके पास दो दिन भी नहीं, शायद कुछ ही घंटे हैं। हमें तुरंत एक रिस्की ऑपरेशन थियेटर में प्रोसीजर करना होगा, वरना ये अभी…”

​दीपक समझ गया कि अब चमत्कार ही नैना को बचा सकता है, लेकिन जाने से पहले वह नैना को उसका ख्वाब देना चाहता था। दीपक दौड़कर बाहर गया। वह बाज़ार से एक लाल रंग का खूबसूरत चोला (शादी का जोड़ा), गहने और सिंदूर की डिब्बी ले आया।

​डॉक्टरों की अनुमति से, उस आईसीयू के केबिन में दीपक ने कांपते हाथों से नैना को वो लाल जोड़ा ओढ़ाया। उसने बहुत प्यार से नैना के होठों पर लिपस्टिक लगाई, उसे गहने पहनाए। नैना की आँखें अधखुली थीं, वह बस दीपक को देख रही थी, उसकी आँखों से खुशी और विदाई के मिले-जुले आंसू बह रहे थे। लाल जोड़े में वह सचमुच एक परी जैसी दुल्हन लग रही थी।

​दीपक ने सिंदूर की डिब्बी खोली। जैसे ही उसने अपनी उंगलियों में सिंदूर लेकर नैना की मांग में भरा… नैना के चेहरे पर एक असीम सुकून की मुस्कान आई। उसने एक आखिरी गहरी साँस ली, उसकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं और उसका हाथ दीपक के हाथ से छूटकर बेड पर गिर गया।

​नैना ने दीपक की दुल्हन बनते ही अपने प्राण त्याग दिए थे।

​दीपक के भीतर का सन्नाटा फट गया। वह पागलों की तरह रोने-बिलखने लगा। लेकिन कुछ ही देर में उसका रोना थम गया। वह एक ज़िंदा लाश बन चुका था। वह बिना कुछ बोले, बिना किसी से कुछ कहे, शांत स्वभाव से अस्पताल के एक सुनसान कोने में फर्श पर बैठ गया। उसकी आँखों के आंसू सूख चुके थे और दिमाग सुन्न था।

सफ़र का अंतिम मोड़ (एक ही श्मशान)

​कुछ घंटों बाद, नैना के ताऊ जी और अस्पताल के लोग नैना के मृत शरीर को एम्बुलेंस में रखकर श्मशान घाट की तरफ ले गए।

​इधर दीपक एक मदहोशी की हालत में, बिना यह देखे कि वह कहाँ जा रहा है, अस्पताल से बाहर निकल आया। वह सड़क के बीचों-बीच चल रहा था। कानों में सिर्फ नैना की आवाज़ गूँज रही थी—मैं देखना चाहती हूँ कि मैं दुल्हन बनकर कैसी लगती हूँ।”

​तभी सामने से आ रही एक तेज़ रफ़्तार कार का हॉर्न बजा, लेकिन दीपक ने मुड़कर भी नहीं देखा। एक ज़ोरदार टक्कर हुई… और दीपक का शरीर सड़क पर जा गिरा। मौके पर ही उसके भी प्राण पखेरू उड़ गए।

​वहाँ खड़े राहगीरों को कुछ समझ नहीं आया कि यह लड़का कौन है और कहाँ से आया है। पॉकेट में कोई आईडी न मिलने और पास ही श्मशान घाट होने के कारण, कुछ भले राहगीरों ने उसकी बॉडी को उठाया और सीधे उसी श्मशान घाट ले गए ताकि वहाँ पुलिस और प्रशासन की मदद से पहचान हो सके।

​श्मशान घाट का दृश्य रूह कंपा देने वाला था। एक तरफ नैना की चिता को मुखाग्नि दी जा रही थी, उसका लाल चोला आग की लपटों में विलीन हो रहा था। तभी राहगीर दीपक के शव को लेकर ठीक उसी के बगल वाले चबूतरे पर पहुँचे। जब वहाँ मौजूद लोगों को पूरी बात समझ आई, तो नियति के इस क्रूर लेकिन रूहानी खेल को देखकर सबकी आँखें नम हो गईं।

​ठीक उसी समय, नैना की चिता के ठीक बगल में दीपक की चिता भी सजाई गई। दोनों की चिताएं एक साथ जल रही थीं।

​वो ४ किलोमीटर का सफर, जो एक सुबह अनजान राहों पर शुरू हुआ था, आज श्मशान की आग की लपटों में मिलकर हमेशा-अमर हो गया। दीपक और नैना इस दुनिया में तो एक न हो सके, लेकिन उनकी रूहें एक साथ इस संसार से विदा हो गईं।

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