वो सफ़र 4 किलोमीटर का ………… (कहानी)
वो सफ़र 4 किलोमीटर का ………… (एक काल्पनिक कहानी)
PART-1: पहली अनजान मुलाकात (सफ़र: 4 किलोमीटर)
दीपक के लिए हर सुबह एक तयशुदा ढर्रे जैसी थी। कार की पिछली सीट पर रखा दफ्तर का बैग, टिफिन और कार के रियर-व्यू मिरर (शीशे) में खुद को देखकर बालों को ठीक करने की वही पुरानी आदत। दिल हमेशा की तरह कहता—सब ठीक है। गाड़ी आगे बढ़ जाती। लेकिन उस दिन जिंदगी का भूगोल थोड़ा बदलने वाला था।
महज दो किलोमीटर आगे बढ़ते ही उसने अपनी सहकर्मी शीतल को सड़क किनारे परेशान खड़ा देखा। उसकी स्कूटी खराब हो चुकी थी। दीपक ने गाड़ी रोकी। स्थानीय इलाका होने के कारण दीपक ने तुरंत एक मैकेनिक का इंतजाम किया और शीतल को दफ्तर छोड़ने के लिए कार में बिठा लिया।
कार अभी शहीद चौक की तरफ बढ़ ही रही थी कि अचानक सब कुछ ठहर सा गया। शहीद चौक—एक ऐसा सुनसान मोड़ जहाँ तीन रास्ते आकर मिलते थे, जहाँ न कोई दुकान थी, न कोई घर, बस एक पुराना सरकारी प्रतीक्षालय था। वहाँ खड़ी थी नैना।
नैना, जो उस सुबह देर से सोकर उठी थी। फोन की बैटरी डेड थी, इंटरव्यू के लिए देर हो रही थी और विवेक (जिसके साथ उसे जाना था) ८:३० बजे का वक्त देकर जा चुका था। घड़ी में ९:१५ हो रहे थे और १० बजे उसका उन्नत नगर में इंटरव्यू था। माँ की नसीहत याद थी—“जल्दी जाओ, पर हर किसी से लिफ्ट मत लेना।”
परेशान नैना की नजर सामने से आती दीपक की कार पर पड़ी। उसने देखा कि ड्राइवर के बगल वाली सीट पर एक लड़की (शीतल) बैठी है। नैना ने हिम्मत जुटाई, हाथ आगे किया और पूरी ताकत से चिल्लाई—“STOP!”
दीपक ने झटके से ब्रेक लगाया। इससे पहले कि कार में बैठे दोनों कुछ समझ पाते, नैना ने पीछे का दरवाजा खोला, दो-तीन बार ‘थैंक्यू’ बुदबुदाया और दरवाजा जोर से बंद कर लिया। दीपक ने शीशे से देखा—पीछे बैठी उस लड़की की आँखें बंद थीं, और वह अपने गले में बंधे भगवान के लॉकेट को चूमकर अपनी धड़कनें शांत कर रही थी।
“कहाँ जाना है?” दीपक ने पूछा।
“उन्नत नगर… मेरा इंटरव्यू है,” नैना ने हांफते हुए जवाब दिया।
“उन्नत नगर… मेरा इंटरव्यू है,” नैना ने हांफते हुए जवाब दिया।
शहीद चौक से उन्नत नगर की दूरी ठीक ४ किलोमीटर थी। उन ४ किलोमीटर में कोई बात नहीं हुई, बस एक खामोश राहत की सांस थी। जैसे ही उन्नत नगर आया, नैना उतरी, दोबारा शुक्रिया कहा और चली गई। दीपक अपने दफ्तर की तरफ बढ़ गया, जो वहाँ से ३ किलोमीटर और आगे था।
PART-2: दूसरी मुलाकात और ४ किलोमीटर का नया सिलसिला
ठीक १० दिन बाद। दीपक ने फिर कार स्टार्ट की, शीशे में बाल ठीक किए और किशोर कुमार के गानों की धुन पर निकल पड़ा। जैसे ही कार शहीद चौक पहुंची, उसकी नजरें ठहर गईं। वहाँ नैना खड़ी थी।
चलती कार से दोनों की नजरें मिलीं। नैना ने हल्का सा हाथ उठाया, दीपक ने पैर हल्के से ब्रेक पर रखा। दोनों को यकीन हुआ कि यह चेहरा जाना-पहचाना है। नैना ने अबकी बार पूरा हाथ उठाया, और दीपक ने पूरी तरह ब्रेक लगा दिया। काली टी-शर्ट, ब्लू जींस, पीठ पर बैग और माथे पर एक छोटा सा तिलक।
वह दौड़कर पास आई। “हाय।”
“हेलो,” दीपक ने मुस्कुराकर कहा।
३-४ सेकंड की एक खूबसूरत झिझक के बाद नैना बोली, “क्या आज मैं आगे बैठ सकती हूँ, या पीछे ही बैठूँ?”
“हेलो,” दीपक ने मुस्कुराकर कहा।
३-४ सेकंड की एक खूबसूरत झिझक के बाद नैना बोली, “क्या आज मैं आगे बैठ सकती हूँ, या पीछे ही बैठूँ?”
दीपक ने बिना कुछ कहे हंसते हुए बाईं तरफ का दरवाजा अनलॉक कर दिया। कार आगे बढ़ी, तो नैना ने चहकते हुए बताया कि उस दिन उसका सिलेक्शन हो गया था और आज उसकी जॉइनिंग है।
“तभी आज भगवान की विशेष पूजा करके आई हैं आप,” दीपक ने कहा।
नैना चौंकी, “आपको कैसे पता?”
“आपके माथे का यह तिलक बता रहा है,” दीपक ने हंसते हुए कहा, और कार के केबिन में दोनों की हंसी गूंज उठी।
“तभी आज भगवान की विशेष पूजा करके आई हैं आप,” दीपक ने कहा।
नैना चौंकी, “आपको कैसे पता?”
“आपके माथे का यह तिलक बता रहा है,” दीपक ने हंसते हुए कहा, और कार के केबिन में दोनों की हंसी गूंज उठी।
ठीक उसी जगह आकर दीपक ने ब्रेक लगाया जहाँ नैना पिछली बार उतरी थी।
“आपको याद था कि मुझे यहीं उतरना है?” नैना ने पूछा।
“हाँ,” दीपक ने संक्षिप्त जवाब दिया।
दरवाजा खोलते हुए दीपक ने मुस्कुराकर पूछा, “फिर नई नौकरी की मिठाई कब खिला रही हैं?”
नैना ने पलटकर देखा और बोली, “जब यूं ही किसी दिन फिर मिल जाएंगे… तब खिला दूंगी।”
“आपको याद था कि मुझे यहीं उतरना है?” नैना ने पूछा।
“हाँ,” दीपक ने संक्षिप्त जवाब दिया।
दरवाजा खोलते हुए दीपक ने मुस्कुराकर पूछा, “फिर नई नौकरी की मिठाई कब खिला रही हैं?”
नैना ने पलटकर देखा और बोली, “जब यूं ही किसी दिन फिर मिल जाएंगे… तब खिला दूंगी।”
PART- 3: अनकहे सुख-दुख और वो गुमनाम रिश्ता (काल्पनिक मुलाकातें)
मौसम बदलते रहे, और शहीद चौक पर उनका मिलना एक अनलिखा नियम बन गया। कभी हफ्ते में दो बार, तो कभी महीने में चार बार। वह ४ किलोमीटर का सफर अब सिर्फ एक रास्ता नहीं रह गया था, बल्कि एक ऐसी दुनिया बन गया था जहाँ दो अजनबी बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे के बेहद करीब आ रहे थे।
एक दिन तेज बारिश हो रही थी। नैना कार में बैठी तो बहुत खामोश थी। दीपक ने गाने की आवाज धीमी कर दी।
“सब ठीक है?” दीपक ने पूछा।
नैना ने खिड़की के बाहर गिरती बूंदों को देखा और कहा, “आज माँ की बहुत याद आ रही है। पापा के जाने के बाद उन्होंने अकेले पाला, आज दफ्तर में जब मुझे सरहाना मिली, तो सबसे पहले उन्हें गले लगाना चाहती थी, पर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं।” उसकी आँख का एक आंसू बारिश की बूंदों जैसा ही पवित्र था। दीपक ने कुछ नहीं कहा, बस गाड़ी की रफ्तार थोड़ी धीमी कर दी ताकि उसे संभलने का वक्त मिल सके। उसने चुपके से गाड़ी का एसी बंद कर दिया ताकि नैना को ठंड न लगे।
“सब ठीक है?” दीपक ने पूछा।
नैना ने खिड़की के बाहर गिरती बूंदों को देखा और कहा, “आज माँ की बहुत याद आ रही है। पापा के जाने के बाद उन्होंने अकेले पाला, आज दफ्तर में जब मुझे सरहाना मिली, तो सबसे पहले उन्हें गले लगाना चाहती थी, पर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं।” उसकी आँख का एक आंसू बारिश की बूंदों जैसा ही पवित्र था। दीपक ने कुछ नहीं कहा, बस गाड़ी की रफ्तार थोड़ी धीमी कर दी ताकि उसे संभलने का वक्त मिल सके। उसने चुपके से गाड़ी का एसी बंद कर दिया ताकि नैना को ठंड न लगे।
किसी और दिन, दीपक परेशान था। दफ्तर के किसी प्रोजेक्ट के डूबने का तनाव उसके चेहरे पर था। उस दिन नैना ने कार में बैठते ही कहा, “आज आपके बाल बिखरे हुए हैं दीपक जी, और आपके चेहरे का आईना कह रहा है कि ‘सब ठीक नहीं है’।” दीपक हैरान रह गया कि जो लड़की सिर्फ ४ किलोमीटर के लिए उसकी सहयात्री बनती है, वह उसकी खामोशी को कितना पढ़ने लगी थी। उस दिन दीपक ने अपने दिल का बोझ हल्का किया।
अजीब बात यह थी कि उन दोनों ने कभी एक-दूसरे का सरनेम (उपनाम) नहीं पूछा। कभी यह नहीं पूछा कि तुम कहाँ रहते हो। और सबसे बढ़कर—उन्होंने कभी एक-दूसरे का फोन नंबर शेयर नहीं किया।
नैना कहती थी, “नंबर रखने से मुलाकातें तय हो जाती हैं दीपक। बिना नंबर के मिलना एक इत्तेफाक होता है, और इत्तेफाक भगवान की मर्जी होते हैं। इसे ऐसे ही रहने देते हैं।”
नैना कहती थी, “नंबर रखने से मुलाकातें तय हो जाती हैं दीपक। बिना नंबर के मिलना एक इत्तेफाक होता है, और इत्तेफाक भगवान की मर्जी होते हैं। इसे ऐसे ही रहने देते हैं।”
PART 4: रसगुल्ले का वादा और शाम की दस्तक
एक दिन दीपक को दफ्तर में देर हो गई। जब वह शाम के धुंधलके में घर लौट रहा था—वक्त ऐसा था मानो रात के दरवाजे पर शाम दस्तक दे रही हो। जैसे ही वह शहीद चौक के पास पहुंचा, उसने देखा कि आगे एक रिक्शे से नैना उतर रही थी।
“हाय नैना!” दीपक ने गाड़ी रोककर आवाज दी।
“अरे हाय दीपक! आज आप भी लेट?” नैना ने पलटकर देखा।
“हाँ, दफ्तर में काम ज्यादा था। आपका क्या हुआ?”
“आज ऑफिस में किसी का बर्थडे था, तो बस वहीं रुकना पड़ गया,” नैना ने एक छोटा सा डिब्बा दिखाते हुए कहा, “आपने मेरी जॉब की मिठाई मांगी थी न? मेरे पास जन्मदिन के कुछ लड्डू हैं, खाएंगे?”
दीपक ने शरारत से कहा, “नहीं-नहीं, मुझे लड्डू नहीं, मुझे तो रसगुल्ले खाने हैं।”
नैना हंस पड़ी, “अच्छा बाबा ठीक है। पर अब पता नहीं अगली मुलाकात कब हो।”
“कल करते हैं न,” दीपक ने पूरे हक से कहा, “रास्ता और समय तो एक ही है। कल रसगुल्ला पक्का।”
नैना ने मुस्कुराते हुए आँखें मटकाईं, “ओहो, इसका मतलब कल आप मुझे फिर से लिफ्ट देने वाले हैं?”
दीपक ने हंसते हुए गाड़ी आगे बढ़ाई और खिड़की से कहा, “बिलकुल नहीं! तुम बस रसगुल्ला दे देना, फिर किसी और की कार से चली जाना।”
पीछे नैना की खिलखिलाहट शाम की हवाओं में घुल गई।
“अरे हाय दीपक! आज आप भी लेट?” नैना ने पलटकर देखा।
“हाँ, दफ्तर में काम ज्यादा था। आपका क्या हुआ?”
“आज ऑफिस में किसी का बर्थडे था, तो बस वहीं रुकना पड़ गया,” नैना ने एक छोटा सा डिब्बा दिखाते हुए कहा, “आपने मेरी जॉब की मिठाई मांगी थी न? मेरे पास जन्मदिन के कुछ लड्डू हैं, खाएंगे?”
दीपक ने शरारत से कहा, “नहीं-नहीं, मुझे लड्डू नहीं, मुझे तो रसगुल्ले खाने हैं।”
नैना हंस पड़ी, “अच्छा बाबा ठीक है। पर अब पता नहीं अगली मुलाकात कब हो।”
“कल करते हैं न,” दीपक ने पूरे हक से कहा, “रास्ता और समय तो एक ही है। कल रसगुल्ला पक्का।”
नैना ने मुस्कुराते हुए आँखें मटकाईं, “ओहो, इसका मतलब कल आप मुझे फिर से लिफ्ट देने वाले हैं?”
दीपक ने हंसते हुए गाड़ी आगे बढ़ाई और खिड़की से कहा, “बिलकुल नहीं! तुम बस रसगुल्ला दे देना, फिर किसी और की कार से चली जाना।”
पीछे नैना की खिलखिलाहट शाम की हवाओं में घुल गई।
PART-5: सन्नाटा और एक अधूरा इंतजार
अगला दिन आया। दीपक ने सुबह बहुत करीने से अपने बाल सेट किए। कार के डैशबोर्ड पर एक छोटा सा डिब्बा रखने की जगह सोची—शायद आज रसगुल्ला मिलने वाला था। वह मुस्कुराता हुआ शहीद चौक पहुंचा।
पर वहाँ नैना नहीं थी।
दीपक ने सोचा शायद देर हो गई होगी। उसने कार किनारे लगाई और १० मिनट इंतजार किया। वह नहीं आई। दीपक चला गया।
अगला दिन आया… नैना फिर नहीं थी।
एक हफ्ता बीत गया। शहीद चौक का वो सरकारी प्रतीक्षालय अब दीपक को काटने दौड़ता था।
एक महीना… फिर छह महीने… और देखते ही देखते साल गुजर गए।
अगला दिन आया… नैना फिर नहीं थी।
एक हफ्ता बीत गया। शहीद चौक का वो सरकारी प्रतीक्षालय अब दीपक को काटने दौड़ता था।
एक महीना… फिर छह महीने… और देखते ही देखते साल गुजर गए।
दीपक को कभी पता ही नहीं चला कि नैना कहाँ गई? क्यों गई? क्या उसका ट्रांसफर हो गया? क्या उसने नौकरी छोड़ दी? या वह किसी और रास्ते से जाने लगी? बिना फोन नंबर के, नैना को ढूंढने का कोई जरिया ही नहीं था। वह जैसी एक रहस्यमयी हवा के झोंके की तरह आई थी, वैसे ही गायब हो गई।
आज भी, जब सालों बाद दीपक अपनी कार से उसी शहीद चौक को पार करता है, तो किशोर कुमार का गाना बजते ही उसके पैर अपने आप ब्रेक की तरफ चले जाते हैं। वह कार की रफ्तार धीमी करता है, अपनी बाईं ओर की खाली सीट को देखता है, और फिर उसकी नजरें सड़क के उस पार पुराने प्रतीक्षालय पर ठहर जाती हैं… जहाँ कभी एक लड़की हाथ उठाकर चिल्लाई थी—“STOP!”
शहीद चौक पर अब कई नए घर और दुकानें बन गई हैं, पर दीपक के दिल के उस कोने में आज भी वो ४ किलोमीटर का सफर और रसगुल्ले का वो अधूरा वादा बिलकुल ताजा है।………………………………..





