विश्व प्रसिद्ध बाबा केदारनाथ धाम की पवित्र यात्रा इन दिनों अपने चरम पर है। इस महायात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव ‘गौरीकुंड‘ है, जो समुद्र तल से 1,981 मीटर की ऊंचाई पर गढ़वाल हिमालय की वादियों में स्थित है। केदारनाथ के मुख्य मंदिर की ओर जाने वाले हर श्रद्धालु के लिए गौरीकुंड एकमात्र और अंतिम मोटर वाहन मार्ग (सड़क संपर्क) है, जहां से बाबा के दर तक पहुंचने के लिए 16 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई शुरू होती है।
धार्मिक मान्यताओं और प्राकृतिक रूप से बेहद समृद्ध होने के कारण न्यूज़ पोर्टल के पाठकों के लिए गौरीकुंड का इतिहास और वर्तमान स्थिति जानना बेहद दिलचस्प है।

🕉️ पौराणिक इतिहास: क्यों खास है यह स्थान?
गौरीकुंड का नाम भगवान शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती (माता गौरी) के नाम पर पड़ा है। हिंदू पुराणों में इस स्थान को लेकर दो बेहद महत्वपूर्ण कथाएं प्रचलित हैं:
- माता गौरी की तपस्या स्थली: मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए इसी स्थान पर कई वर्षों तक कठोर ध्यान और योग साधना की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने इसी स्थान पर उन्हें विवाह का प्रस्ताव दिया था, जिसके बाद उनका विवाह पास ही स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर में संपन्न हुआ था।

- भगवान गणेश की उत्पत्ति कथा: लोक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने इसी कुंड में स्नान करने से पहले अपने शरीर के मैल (उबटन) से एक बालक की आकृति बनाकर उसमें प्राण फूंके थे, जो बाल गणेश कहलाए। जब गणेश जी ने भगवान शिव को माता के कक्ष में अंदर जाने से रोका, तो शिवजी ने क्रोध में उनका सिर काट दिया था। बाद में माता पार्वती के अनुरोध पर हाथी का सिर जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित किया गया था।
♨️ मुख्य आकर्षण और विशेषताएं
- प्राकृतिक गर्म पानी का स्रोत (Hot Springs): गौरीकुंड की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित प्राकृतिक गर्म पानी के सोते हैं। केदारनाथ की चढ़ाई शुरू करने से पहले श्रद्धालु इस पवित्र जल में स्नान करते हैं, जिससे पहाड़ों की कड़ाके की ठंड में शरीर की थकान मिटती है और यात्रा के लिए नई ऊर्जा मिलती है।
- प्राचीन गौरी देवी मंदिर: यहाँ माता गौरी को समर्पित एक ऐतिहासिक मंदिर है, जहाँ माता पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की धातु की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं。
- पार्वती शिला: मंदिर परिसर के पास ही वह पवित्र चट्टान मौजूद है, जिस पर बैठकर माता पार्वती ने तपस्या की थी।
