
देवभूमि के पहाड़ आज एक ऐसी चुनौती से जूझ रहे हैं जिसने सदियों पुरानी परंपरा और जीवन को खतरे में डाल दिया है। कभी गांव-गांव की प्यास बुझाने वाले मंगरा और धारे अब इतिहास बनने की कगार पर थे, लेकिन अब उन्हें बचाने के लिए एक ‘भगीरथ प्रयास’ शुरू हो गया है। ANI News के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने इसके लिए SARRA (Spring and River Rejuvenation Authority) का गठन किया है, जो इन मरते हुए जल स्रोतों में फिर से प्राण फूंकेगा।

खबर के मुख्य ‘धमाकेदार’ पॉइंट्स:
- संकट की दस्तक: रिपोर्टों के मुताबिक, राज्य के लगभग 12,000 प्राकृतिक स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। Times of India की एक ताज़ा रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर अब कदम नहीं उठाए गए, तो यह जल संकट अपरिवर्तनीय हो सकता है।
- 929 स्रोतों का हुआ कायाकल्प: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जानकारी दी है कि SARRA के माध्यम से अब तक 929 जल स्रोतों का सफलतापूर्वक उपचार (treatment) किया जा चुका है।
- नई तकनीक से ‘रिचार्ज’: सरकार ने एक क्रांतिकारी योजना ‘डायरेक्ट इंजेक्शन वॉटर सोर्स रिचार्ज’ शुरू की है। इसमें निष्क्रिय पड़े हैंडपंपों में बारिश का पानी इंजेक्ट करके जमीन के नीचे के जल स्तर को सुधारा जाएगा Projects Today।
- ‘वॉटर हीरो’ की कहानी: बागेश्वर के 60 वर्षीय
जगदीश कुनियाल
और
चन्दन सिंह नयालजैसे स्थानीय नायक अपने दम पर सूख चुके गधेरों और नौलों को जिंदा कर रहे हैं। इनके प्रयासों से आज कई गांवों में साल भर पानी बह रहा है।
क्यों खास हैं ये ‘मंगरा’?
उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी 90% पीने का पानी इन्हीं प्राकृतिक झरनों (Springs) से आता है। ये सिर्फ पानी के स्रोत नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का मंदिर हैं। पर्यटन और बढ़ते कंक्रीट के जंगलों ने इन्हें काफी नुकसान पहुँचाया है, लेकिन अब ‘चाल-खाल’ जैसी पारंपरिक विधियों और आधुनिक विज्ञान के संगम से इन्हें फिर से जीवित किया जा रहा है
