वापसी को तरसता उत्तराखंड क्रिकेट का लोड्स ( एक समीक्षा )

दुनिया का हर बल्लेबाज़ का ये सपना होता है कि वो लोड्स के मैदान पर अपने बल्ले का जोहर बिखेरे और शतक बनाये वो मैदान न केवल खिलाड़ियों का पसंद का मैदान है बल्कि दर्शक भी इस मैदान में क्रिकेट का खूब लुफ्त लेते हैं। अगर किसी अन्य मैदान को लोड्स की संज्ञा दी जाये तो आप खुद समझ सकते हैं कि उस मैदान का महत्व क्रिकेट के लिए कितना है।

ऐसा ही मैदान उत्तरखंड कि राजधानी देहरादून में हैं जिसको उत्तरखंड का लोड्स कहा जाता है जो कि खिलाड़ियों और दर्शको का पसंदीदा मैदान है। हम यहाँ बात कर रहे हैं देहरादून के रेंजर्स क्रिकेट ग्राउंड की जो कि देहरादून और उत्तराखंड के क्रिकेट प्रेमियों का पसंदीदा ग्राउंड है यह मैदान दूँन शहर के मध्य में है इसलिए यहाँ पर किसी भी परिवहन से आसानी से आया जा सकता है साथ ही यह दूँन के हर दुरस्त क्षेत्र समान दुरी पर है। इस मैदान में कोई भी क्रिकेट प्रतियोगिता हो 500 से 1000 दर्शक आपको मिल ही जायेगे
ये प्रतियोगिता हो चुकी हैं सम्पन्न
रेंजर्स मैदान में गोल्ड कप , उत्तराखंड कप , गिरीश बद्री ( सभी आल इंडिया ) सचिवालय कप , बार एसोशिसन टूनामेंट , यूथ कप नवनीश खंडूरी T20 , अंतर महाविधालय , के अलावा UPL और UCL जैसी क्रिकेट प्रतियोगिता सम्पन्न हो चुकी हैं जिन प्रतियोगिताओ में कई अंतरष्ट्रीय, राष्ट्रीय, और IPL के खिलाडी खेल चुके हैं।

लकी है रेंजर्स ग्राउंड
रेंजर्स मैदान काफी लकी मन जाता है कई खिलाडी ने जैसे ही मैदान में खेला सीधा उनका चयन भारतीय टीम में हुआ जिसका ताज़ा उदाहरण भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी हैं जो गोल्ड कप खेलने झारखण्ड कि टीम से यहाँ आये थे और सीधे उनका चयन भारतीय टीम में हुआ , धोनी के अतरिक्त परवीन कुमार , पियूष चावला , आर पी सिंह , सौरभ तिवारी , जोगिंदर शर्मा , MKS प्रसाद , दिनेश मोंगिया , आदि भारतीयों क्रिकेटर ने इस मैदान पर खेला है और दर्सको का खूब प्यार पाया है। इस मैदान पर पाकिस्तान , नेपाल और बांग्लादेश की टीम भी खेल चुकी हैं।

रेंजर्स मैदान की वर्तमान परस्तिथि
रेंजर्स मैदान की वर्तमान परस्तिथि खेलने लायक नहीं है अब इस मैदान पर देहरादून का संडे मार्केट लगता है या कभी कोई अन्य कार्यक्रम सम्पन्न होते है , पहले इस मैदान में लगातार क्रिकेट टूनामेंट होते थे तो इस मैदान का रख रखाव बहुत अच्छे से होता था पर जैसे ही करना काल आया तो करना का दंश इस मैदान को भी झेलना पड़ा करोना के समय इस मैदान में घास ने झाड़ियों का रूप ले लिया , पिच खराप हो गयी करोना के चलते दो साल तक कोई भी खेल गतिविधि नहीं हुई फिर क्रिकेट आयोजकों ने अन्य पेशेवर मैदानों का रुख करना प्रारम्भ कर दिया फिर FRI से यह मैदान जिला प्रशासन के पास आ गया और फिर इस मैदान का प्रयोग राजस्व के लिए अन्य इवेंट्स के लिए होए लग गया और अब रेंजर्स मैदान जैसी अपनी सांसे गिनते हुए इंतज़ार कर रहा है कि क्या पता फिर मेरी वापसी हो पाए क्रिकेट के लिए क्या पता ………

