गढ़वाल का वैकुंठ चतुर्दशी मेला उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन मेलों में से एक है. यह मेला धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व रखता है और हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है.
कब मनाया जाता है?
वैकुंठ चतुर्दशी का पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है. यह आमतौर पर दीपावली के लगभग 14 दिन बाद आता है और कार्तिक पूर्णिमा से ठीक एक दिन पहले पड़ता है. 2024 में, वैकुंठ चतुर्दशी 14 नवंबर को मनाई जाएगी.

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
वैकुंठ चतुर्दशी मेला मुख्य रूप से श्रीनगर गढ़वाल में स्थित कमलेश्वर महादेव मंदिर में आयोजित होता है. इस मेले का ऐतिहासिक महत्व रामायण काल से जुड़ा हुआ माना जाता है भगवान राम द्वारा पूजा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए यहां भगवान शिव की 108 कमल पुष्पों से पूजा की थी. जब एक कमल कम पड़ गया, तो उन्होंने अपनी एक आंख अर्पित करने का निश्चय किया, जिससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें पाप मुक्त किया. इसी कारण भगवान राम को “कमल नयन” भी कहा जाता है. भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र की प्राप्ति: एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने सहस्त्र कमल पुष्पों से भगवान शिव की आराधना कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था. इस वजह से यह दिन हरि (विष्णु) और हर (शिव) के मिलन का प्रतीक भी माना जाता है. यह एकमात्र दिन है जब भगवान विष्णु को बिल्व पत्र (जो पारंपरिक रूप से शिव से जुड़े हैं) और भगवान शिव को तुलसी पत्र (जो पारंपरिक रूप से विष्णु से जुड़े हैं) चढ़ाए जाते हैं. पुत्र प्राप्ति की कामना: यह मेला विशेष रूप से निसंतान दंपत्तियों के लिए महत्वपूर्ण है. पुत्र प्राप्ति की कामना से दंपत्ति रात्रि भर हाथ में जलता हुआ दीपक लेकर भगवान भोलेनाथ की उपासना करते हैं, जिसे “खड़ दिया पूजा” कहा जाता है.

मेले की परंपराएं और गतिविधियां
वैकुंठ चतुर्दशी मेला केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक भव्य उत्सव का रूप लेता है जिसमें कई सांस्कृतिक और पारंपरिक गतिविधियां होती हैं कमलेश्वर महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना: मेले का केंद्रबिंदु कमलेश्वर महादेव मंदिर होता है, जहां भक्त पूजा-अर्चना करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ध्वजा यात्रा: मेले का एक प्रमुख आकर्षण ध्वजा यात्रा है, जिसमें पवित्र ध्वज को मंदिर से अलकनंदा नदी के तट तक एक भव्य शोभायात्रा के रूप में ले जाया जाता है. इस यात्रा में भक्तिपूर्ण मंत्रोच्चार, ढोल-नगाड़ों की धुनें और जीवंत लोक नृत्य शामिल होते हैं, जिससे एक उत्साहपूर्ण आध्यात्मिक वातावरण बनता है. सांस्कृतिक कार्यक्रम: मेले में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकगीत, लोकनृत्य, स्टार नाइट, गढ़वाली स्टार नाइट, कव्वाली नाइट और “श्रीनगर के सितारे” जैसे आयोजन भी होते हैं, जो मेले की शोभा बढ़ाते हैं. स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा: इस मेले के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ होता है. साहसिक खेल और मनोरंजन: हाल के वर्षों में, मेले में रिवर राफ्टिंग और हॉट एयर बैलून जैसे साहसिक खेलों को भी शामिल किया गया है, साथ ही बच्चों के लिए झूले और अन्य मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध होते हैं.
श्रीनगर गढ़वाल और आसपास के दर्शनीय स्थल
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड का एक सुंदर शहर है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है. यह चार धाम यात्रा के लिए एक प्रवेश द्वार के रूप में भी कार्य करता है. मेले के दौरान आप श्रीनगर और उसके आसपास कई अन्य स्थानों का भी भ्रमण कर सकते हैं: कमलेश्वर महादेव मंदिर: मेले का मुख्य स्थल. धारी देवी मंदिर: अलकनंदा नदी के ऊपर एक चट्टान पर स्थित, यह मंदिर देवी धारी को समर्पित है और stunning दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है. श्रीनगर बांध: एक इंजीनियरिंग चमत्कार और सुंदर दृश्यों के साथ एक लोकप्रिय स्थान. मालेथा यह एक छोटा लेकिन प्रसिद्ध गांव है जो माधो सिंह भंडारी की बहादुरी के लिए जाना जाता है. गोला बाजार: श्रीनगर गढ़वाल में खरीदारी और घूमने के लिए एक जीवंत बाजार. कीर्तिनगर: अलकनंदा नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा शहर.देवलगढ़: श्रीनगर से 17 किमी दूर स्थित यह पहाड़ी शहर कभी गढ़वाल साम्राज्य की राजधानी था और गौरा देवी मंदिर व मां राज राजेश्वरी मंदिर जैसे मंदिरों के लिए जाना जाता है.केशोराय मठ: 1682 ईस्वी में चट्टानों को काटकर बनाया गया एक सुंदर मंदिर.किलकिलेश्वर मंदिर: अलकनंदा नदी के तट पर स्थित भगवान शिव को समर्पित मंदिर, जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी.शंकर मठ: आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित माना जाने वाला एक और मंदिर.वैकुंठ चतुर्दशी मेला गढ़वाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गहरी आस्था का प्रतीक है, जो उत्तराखंड के लोगों को एक साथ बांधे रखता है.
श्रीनगर गढ़वाल के वैकुंठ चतुर्दशी मेले में “खड़ दिया पूजा” एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक अनुष्ठान है, जो विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपत्तियों द्वारा किया जाता है। इस पूजा का गढ़वाल क्षेत्र में बहुत गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
क्या है खड़ दिया पूजा?
“खड़ दिया” का शाब्दिक अर्थ है “खड़े होकर दीपक जलाना”। इस अनुष्ठान में, संतानहीन दंपत्ति भगवान शिव से पुत्र या पुत्री रत्न की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हुए, पूरी रात हाथ में जलता हुआ दीपक लेकर कमलेश्वर महादेव मंदिर में खड़े रहते हैं। यह एक कठिन तपस्या मानी जाती है, जिसमें शारीरिक और मानसिक दृढ़ता की आवश्यकता होती है।

खड़ दिया पूजा का महत्व और मान्यता
इस पूजा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं और मान्यताएं हैं, जो इसके महत्व को और बढ़ाती हैं पौराणिक कथा मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने राक्षसों पर विजय प्राप्त करने के लिए यहां भगवान शिव की सहस्त्र (हजार) कमल पुष्पों से तपस्या की थी, तो शिवजी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक कमल पुष्प छिपा दिया। तब भगवान विष्णु ने अपनी एक आँख अर्पित करने का संकल्प लिया। यह सब एक निसंतान ऋषि दंपत्ति देख रहे थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, माता पार्वती के अनुरोध पर भगवान शिव ने उन्हें संतान प्राप्ति का वरदान दिया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (वैकुंठ चतुर्दशी) की रात को संतान की कामना करने वाले दंपत्ति यहां आते हैं और “खड़ दिया” अनुष्ठान करते हैं। पुत्र प्राप्ति की कामना यह अनुष्ठान विशेष रूप से उन दंपत्तियों के लिए है जो संतान सुख से वंचित हैं। उन्हें विश्वास है कि भगवान कमलेश्वर महादेव की कृपा से उनकी संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है। श्रद्धा और तपस्या: “खड़ दिया” अनुष्ठान केवल दीपक जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, धैर्य और तपस्या का प्रतीक है। पूरी रात खड़े रहकर दीपक पकड़े रहना एक कठिन कार्य है, जो भक्तों की अटूट आस्था को दर्शाता है। विदेशों से भी आते हैं श्रद्धालु: इस पूजा की ख्याति इतनी अधिक है कि न केवल भारत के विभिन्न राज्यों से बल्कि विदेशों से भी निःसंतान दंपत्ति कमलेश्वर महादेव मंदिर में इस अनुष्ठान को करने आते हैं।
कैसे होती है खड़ दिया पूजा?
- पंजीकरण: जो दंपत्ति खड़ दिया अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पहले मंदिर प्रशासन के पास अपना पंजीकरण कराना होता है अनुष्ठान की शुरुआत: वैकुंठ चतुर्दशी की शाम को गोधूलि बेला (शाम) में मंदिर के महंत द्वारा पहला दीपक जलाया जाता है, जिसके साथ ही “खड़ दिया” पूजा की रस्म का विधिवत शुभारंभ होता है। भर जागरण दंपत्ति पूरी रात मंदिर परिसर में हाथ में जलता हुआ दीपक लेकर खड़े रहते हैं। इस दौरान वे भजन-कीर्तन करते हैं और भगवान शिव का ध्यान करते हैं। सुबह समापन सूर्योदय के साथ इस अनुष्ठान का समापन होता है, जिसके बाद भक्त भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। “खड़ दिया” पूजा वैकुंठ चतुर्दशी मेले का एक ऐसा पहलू है जो इसे सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आशा, विश्वास और अलौकिक शक्ति में आस्था का प्रतीक बनाता है।
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