पहली सीरीज में तूफान बन कर आये विजय भारद्वाज।


1998 – 99 का और भारत की क्रिकेट टीम केन्या के दौरे पर थी जहा पर भारत, केन्या के अलावा ज़िम्बाबे और द० अफ्रीका की टीम भी थी भारत की तरफ से एक नए खिलाडी को जगह मिली थी जो कर्नाटक से घरेलु क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन कर के भारतीय टीम में शामिल हुए थे जो निचले क्रम के बेतरीन बल्लेबाज होने के साथ एक उपयोगी गेंदबाज़ भी थे जिसका नाम था विजय भारद्वाज Vijay Bharadwaj ।


विजय ने जब अपने खेल को खेलना शुरू किया तो लगा ही नहीं की वो एक नया खिलाडी हो ऐसा लगा की इस आलराउंडर खिलाडी के पास सालो खेलने का अनुभव है विजय भारद्वाज ने माध्यम क्रम पर हर गेंदबाज का डटकर सामना किया और भारत को मुश्किल समय में जीत दिलाई और जब गेंद को हाथ में पकड़ते ही बल्लेबजों के जैसे सर में दर्द होने लगता था, वो किस को किस तरह से आउट कर दे कोई पता नहीं चलता था अपने पहले ही टूनामेंट में मन ऑफ़ दी सीरीज बन गए लगा की भारत को एक कपिल देव और मनोज प्रभाकर जैसा कोई हरफ़नमौला खिलाडी मिल चूका है और ये भारत की तरफ से लम्बा खेलते हुए कई कीर्तिमान बनाएगा, केन्या टूर में बेहतरीन खेल के बदौलत उनको न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट मैच में भी जगह मिली पर जैसे ही केन्या दौरा समाप्त हुवा वैसे ही ऐसा लगा जैसे की उनके प्रदर्शन को किसी की नज़र लग गयी हो , और सभी क्रिकेट प्रेमी उस पुराने विजय को ढूंढ़ते रह गए। ना उनके बेट से रन बने ना गेंद से कोई कारनामा कर पाए फिर ऐसा नहीं लगा की वो आगे भी खेल पाएंगे और ठीक हुवा भी वही कि टीम ने जल्द ही विजय भारद्वाज नाम से अपना पल्ला झाड़ दिया और फिर कभी चयनकर्ता की नज़र विजय भारद्वाज पर नहीं पड़ी और विजय की वापसी की उम्मीदे बस इंतज़ार में बदल गयी और ये इंतज़ार कभी भी खतम नहीं हुआ , विजय भारद्वाज का छोटा ही कैरियर बन पाया।
2006 में उन्होंने क्रिकेट से सन्यास ले लिया फिर वो शुरुआती तीन सीजन रॉयल चैलेंजर बेंगलोर से सहत्यक कोच के तौर जुड़े रहे

विजय भारद्वाज ने अपने अंतरास्ट्रीय करियर में 10 एकदिवसीय के साथ ३ टेस्ट मैच ही खेले इण्डिया से क्रिकेट खेलना शायद उतना मुश्किल नहीं है बस मुश्किल है वह देर तक टिक कर पर्फ़ोम करना , पहली सीरीज में तूफान बन कर आये विजय भरद्वाज और फिर कभी नहीं कर पाए आये टीम में वापसी|
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