उत्तराखंड की देवभूमि में, चमोली जिले के गोचर में, अलकनंदा नदी के तट पर आज से ऐतिहासिक गोचर मेला का भव्य शुभारंभ हो गया है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला यह मेला, उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति, कला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

📜 व्यापार से संस्कृति तक का सफर
मेले का उद्घाटन करते हुए, माननीय मुख्यमंत्री ने इसके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। इस मेले की शुरुआत 1943 में तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर बर्नडी ने भारत-तिब्बत व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की थी। हालाँकि तिब्बत व्यापार बंद हो चुका है, लेकिन आज भी यह मेला पशुधन (मवेशी), कृषि उत्पादों और हस्तशिल्प के क्रय-विक्रय का एक बड़ा मंच बना हुआ है।
“गोचर मेला सिर्फ एक बाज़ार नहीं है, यह हमारी लोक संस्कृति और स्वाभिमान का आईना है। यह मेला राज्य के दूर-दराज के क्षेत्रों के कारीगरों और किसानों को सीधा मंच प्रदान करता है।” — राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा।

🎨 आकर्षण का केंद्र बनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ
मेले के पहले दिन, गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के कलाकारों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं। थड्या, चौंफला और पांडव नृत्य की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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मुख्य आकर्षण: इस वर्ष मेले में स्थानीय ऊन उद्योग को बढ़ावा देने पर विशेष ज़ोर दिया गया है, जिसके लिए विशेष स्टॉल लगाए गए हैं।
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प्रशासनिक पहल: कृषि, बागवानी और औद्योगिक विकास को समर्पित सरकारी विभागों के स्टॉल भी लगाए गए हैं, जहाँ किसानों और युवाओं को नई योजनाओं की जानकारी दी जा रही है।
🗓️ एक सप्ताह चलेगा उत्सव
यह मेला अगले एक सप्ताह तक चलेगा, जिसमें विभिन्न खेलकूद प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक संध्याएँ और लोक कलाकारों के कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। उम्मीद है कि इस साल मेले में राज्यभर से हज़ारों आगंतुक जुटेंगे, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।
गोचर का समतल मैदान, जिसे मेले के लिए भव्य रूप से सजाया गया है, एक बार फिर से पहाड़ी जीवन और आधुनिक विकास के संगम का साक्षी बन रहा है।
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