कभी उत्तराखंड के हर गाँव की पहचान रही जांदरे की घरघराहट अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है। पत्थर की यह पारंपरिक चक्की, जिसने सदियों तक पहाड़ी घरों में अनाज को आटे में बदला, आज मशीनों और आधुनिकता के शोर में अपनी पहचान खो रही है।

पहाड़ों में ‘जांदरा’ सिर्फ चक्की नहीं थी, बल्कि जीवन का हिस्सा थी। सुबह-सुबह जब गाँव की गलियों में जांदरे की मधुर घरघराहट गूंजती थी, तो मानो दिन की शुरुआत ही आशीर्वाद के स्वर से होती थी। महिलाएँ गीत गातीं, बच्चे खेलते, और आटे की महक पूरे आंगन में फैल जाती।

लेकिन अब न वो स्वर हैं, न वो सुगंध।
अब गाँवों में बिजली की चक्कियाँ लग गई हैं, और पुराने जांदरे या तो खंडहर बन चुके हैं या किसी कोने में जंग खाए पड़े हैं।
“पहले हम हाथ से पीसा आटा खाते थे, जो स्वाद और पौष्टिकता में अलग ही होता था। अब सब कुछ मशीनों पर निर्भर है,” टिहरी जिले की बुजुर्ग कमला देवी कहती हैं। “हमारी पीढ़ी के बाद शायद बच्चे ‘जांदरा’ शब्द भी न जानें।”
पुरातत्व और लोकसंस्कृति के जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ एक औज़ार का नहीं, बल्कि पूरे सांस्कृतिक ताने-बाने का विलुप्त होना है। जांदरा, घट्टी, ओखली, रांपा जैसे पारंपरिक उपकरण पहाड़ की पहचान थे, जो अब ‘विरासत संग्रहालयों’ में सीमित होते जा रहे हैं।
सरकार और सामाजिक संस्थाएँ भी अब इन पारंपरिक तकनीकों को “सांस्कृतिक धरोहर” के रूप में संरक्षित करने की बात कर रही हैं। कुछ युवाओं ने पर्यटक गाँवों में पुराने जांदरे को फिर से चलाने की पहल भी की है — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि कभी अनाज का हर दाना मेहनत, संगीत और परंपरा से पिसा करता था।
