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भोटिया जनजाति की जोला चाय (ज्या ) एक अनूठा स्वाद और परंपरा -

उत्तराखंड की भोटिया जनजाति की खास घी वाली चाय

उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों में रहने वाली भोटिया जनजाति अपनी अनूठी संस्कृति और परंपराओं के लिए जानी जाती है. इन्हीं परंपराओं में से एक है उनकी खास घी वाली चाय स्थानीय भाषा में इसको जोला चाय (ज्या ) कहते है|, जिसे वे बड़े चाव से पीते हैं. यह सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली, मौसम और उपलब्ध संसाधनों का एक अहम हिस्सा है.|

घी वाली चाय: सिर्फ स्वाद नहीं, सेहत भी

भोटिया जनजाति के लोग मुख्य रूप से भेड़-बकरी पालने वाले और व्यापार करने वाले होते हैं. उनका जीवन पहाड़ों की कठोर परिस्थितियों और ठंडे मौसम में गुजरता है. ऐसे में यह घी वाली चाय उनके लिए सिर्फ स्वाद का ही नहीं, बल्कि ऊर्जा और गर्मी का भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है. यह चाय उन्हें दिन भर काम करने के लिए स्फूर्ति देती है और ठंड से बचाती है. इस चाय को बनाने का तरीका भी थोड़ा अलग होता है. इसमें सामान्य चाय पत्तियों के साथ मक्खन या शुद्ध घी का इस्तेमाल होता है. कई बार इसमें थोड़ा नमक भी डाला जाता है, जो इसे एक नमकीन और दिलकश स्वाद देता है.

कैसे बनती है यह खास चाय?

घी वाली चाय बनाने के लिए, सबसे पहले पानी को उबाला जाता है और उसमें चाय पत्ती डाली जाती है. कुछ देर उबलने के बाद, इसमें मक्खन या घी डाला जाता है और फिर इसे अच्छी तरह मथा जाता है ताकि घी चाय में पूरी तरह मिल जाए और एक झागदार परत बन जाए. आखिर में, इसमें चुटकी भर नमक डालकर गर्मागर्म परोसा जाता है.

सांस्कृतिक महत्व

यह चाय भोटिया समुदाय में मेहमानवाजी का भी प्रतीक है. जब कोई मेहमान उनके घर आता है, तो उन्हें गर्मजोशी से घी वाली चाय पेश की जाती है. यह उनके सामाजिक मेलजोल और सामुदायिक भावना का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

 डोंगमो (Dongmo) या लकड़ी का मथनी वाला बर्तन

घी वाली चाय बनाने में सबसे महत्वपूर्ण और खास बर्तन डोंगमो होता है। यह एक लंबा, बेलनाकार, लकड़ी का बर्तन होता है, जो आमतौर पर लकड़ी के तने से खोखला करके बनाया जाता है। इसकी बनावट ऐसी होती है कि इसमें चाय, घी और नमक को अच्छी तरह से मथा जा सके। बनावट: इसमें एक ढक्कन होता है और एक लंबी छड़ी होती है, जिसके सिरे पर एक डिस्क या पिस्टन लगा होता है। इस्तेमाल: चाय को उबालने के बाद, इसे इस डोंगमो में डाला जाता है। फिर इसमें घी और नमक डालकर, छड़ी को ऊपर-नीचे तेजी से हिलाकर मथा जाता है। इस प्रक्रिया से घी और चाय पूरी तरह से मिल जाते हैं और एक गाढ़ा, मलाईदार और झागदार मिश्रण बन जाता है। यह मथने की प्रक्रिया ही इस चाय को इसका अनूठा स्वाद और बनावट देती है।

आज भी उत्तराखंड के कई हिस्सों में, खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों और ऊंचे पहाड़ों में, भोटिया जनजाति अपनी इस अनूठी परंपरा को जीवित रखे हुए है. यह घी वाली चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि उनकी समृद्ध संस्कृति और पहाड़ों के साथ उनके गहरे जुड़ाव का एक प्रमाण है. Bhotiya Tribe’s Ghee Tea: A Unique Taste and Tradition

 

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