उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गाँव हमेशा से प्रकृति और देवताओं के संरक्षण पर निर्भर रहे हैं। इन गाँवों में सबसे महत्वपूर्ण देवता होते हैं भैरव, जो कि शिव जी के रूप माने जाते हैं और गाँव की रक्षा करते हैं।

कथा:
बहुत समय पहले, गढ़वाल के एक छोटे से गाँव में लोग शांति से रहते थे। गाँव के पास जंगल और पहाड़ थे, और वहाँ डाकुओं और जंगली जानवरों का आतंक बढ़ता जा रहा था। गाँव के लोग दिन-रात भय में रहते थे।
एक दिन गाँव के बुजुर्गों ने सुझाव दिया कि भैरव की पूजा की जाए ताकि गाँव सुरक्षित हो। गाँव के लोगों ने भैरव के मंदिर में जाकर भव्य पूजा-अर्चना की।
पूजा के बाद, कुछ आश्चर्यजनक घटनाएँ हुईं:
डाकुओं ने गाँव का रास्ता भटक लिया और गाँव तक नहीं पहुँच पाए। जंगली जानवरों का व्यवहार बदल गया, और वे गाँव के आसपास सुरक्षित दूरी बनाए रखने लगे। गाँव में शांति और समृद्धि लौट आई। गाँव वालों ने इसे भैरव की दिव्य शक्ति माना। इसके बाद हर साल गाँव में भैरव की पूजा और मेला आयोजित होने लगा। इस कथा का संदेश है कि भक्ति, श्रद्धा और नियम के अनुसार पूजा करने से संकट दूर हो सकता है।

सीख और महत्व:
- सुरक्षा और संरक्षण – भैरव गाँव के संरक्षक हैं।
- भक्ति और श्रद्धा – कठिनाइयों में देवी-देवताओं की भक्ति से मदद मिलती है।
- सामूहिक प्रयास – गाँव के लोग मिलकर संकट से निपट सकते हैं।
- सांस्कृतिक मूल्य – यह कथा आज भी पर्व और मेलों में जीवित है।
अगर आप चाहो तो मैं इस कथा का लोककथा रूपांतरित कहानी भी बता सकता हूँ, जिसे बच्चे आसानी से सुनकर समझ सकें, जिसमें भैरव का व्यक्तित्व और गाँव वालों के साहस को रोचक ढंग से दिखाया गया हो।
