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टिंचरी माई: एक चिंगारी जो आंदोलन बन गई -

उत्तराखंड की पहाड़ियों में कभी एक ऐसी महिला उठ खड़ी हुई थी, जिसने समाज में व्याप्त नशे की बुराई के खिलाफ अकेले मोर्चा खोल दिया था। नाम था — दीपा नौटियाल, लेकिन लोग उन्हें श्रद्धा से “टिंचरी माई” कहने लगे। आज जब समाज फिर से नशा-मुक्ति की बातें कर रहा है, तब टिंचरी माई का जीवन संघर्ष एक मिसाल बनकर सामने आता है।


गरीबी, विधवापन और संघर्ष से निकली एक लौ

सन 1917 के आसपास पौड़ी गढ़वाल के मंज्यूर गांव में जन्मीं दीपा नौटियाल का बचपन बेहद कठिन था। माँ-बाप दोनों का साया बचपन में ही उठ गया। मात्र सात वर्ष की उम्र में विवाह और उन्नीस में विधवापन — इन परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बनाया। उन्होंने सांसारिक बंधनों से मुक्ति लेकर संन्यास लिया और समाज सेवा को अपना जीवन बना लिया। लोग उन्हें “इच्छागिरी माई” भी कहा करते थे।


जब जली शराब की भट्टी – और जग गया पहाड़

टिंचरी माई के जीवन की सबसे चर्चित घटना तब घटी जब उन्होंने एक गांव में चल रही अवैध शराब की भट्टी को केरोसिन डालकर जला दिया
प्रशासन तक आवाज़ पहुँची तो भी कार्रवाई नहीं हुई — तब माई ने स्वयं कदम उठाया। इस साहसिक कदम ने पूरे गढ़वाल में हलचल मचा दी। गाँव-गाँव की महिलाएं उनके साथ शराबबंदी के आंदोलन में उतर आईं। यहीं से उन्हें जनता ने “टिंचरी माई” का नाम दिया — “टिंचरी” यानी वह आग जिससे भट्टी जलाई जाती है, और “माई” यानी माँ।


शिक्षा और सामाजिक सुधार की अग्रदूत

नशा-विरोधी अभियान के अलावा टिंचरी माई ने गांवों में शिक्षा, जल व्यवस्था और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए भी संघर्ष किया। उन्होंने खुद धन जुटाकर कई जगह विद्यालयों की स्थापना में योगदान दिया। वे कहती थीं –

“अगर बेटी पढ़ेगी तो समाज सुधरेगा, वरना बर्बादी का सिलसिला चलता रहेगा।”


लोगों की माई, आंदोलन की मशाल

टिंचरी माई ने जिस दौर में यह आंदोलन चलाया, उस समय महिलाओं की आवाज़ समाज और प्रशासन दोनों में कम सुनी जाती थी। मगर उनकी जिद, सादगी और निडरता ने हालात बदल दिए।
उनका आंदोलन धीरे-धीरे एक जन-लहर बन गया जिसने उत्तराखंड की सामाजिक चेतना को नई दिशा दी।


माई की विरासत

17 जून 1993 को टिंचरी माई का देहांत हो गया, लेकिन उनके द्वारा जगाई गई सामाजिक जागरूकता की लौ आज भी जीवित है।
उनकी याद में कई स्थानों पर नशा-मुक्ति अभियान, महिला जागरूकता कार्यक्रम और विद्यालय संचालित हैं।


आज भी ज़रूरत है ऐसी “माई” की

जब उत्तराखंड के पहाड़ फिर से नशे और बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं, तब टिंचरी माई का जीवन हमें याद दिलाता है कि एक अकेली औरत भी पूरे समाज की सोच बदल सकती है।
उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है —

“जब तक शराब है, तब तक शांति नहीं। जब तक जागरूकता है, तब तक उम्मीद है।”


🕯️ रिपोर्टर: [UPENDRA SINGH PANWAR]
📰 स्थान:  देहरादून
📅 तारीख: [6/11/25]
📸 फ़ोटो क्रेडिट: Google

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