फ़रवरी में सबसे कम दिन क्यों होते हैं?
जानिए 28 और 29 दिनों के पीछे छिपा इतिहास और विज्ञान
हर साल जब फ़रवरी का महीना आता है, तो लोगों के मन में एक सवाल ज़रूर उठता है — आख़िर फ़रवरी में ही सबसे कम दिन क्यों होते हैं?
जब साल के बाकी महीनों में 30 या 31 दिन होते हैं, तो फ़रवरी सिर्फ़ 28 दिन की क्यों होती है, और कभी-कभी 29 दिन की ही क्यों?
इस सवाल का जवाब विज्ञान से ज़्यादा इतिहास और प्राचीन कैलेंडर प्रणाली में छिपा हुआ है।

पृथ्वी की चाल और लीप ईयर का विज्ञान
पृथ्वी को सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाने में लगभग 365 दिन 6 घंटे लगते हैं। लेकिन हमारे कैलेंडर में साल को 365 दिन का माना जाता है।
ये अतिरिक्त 6 घंटे हर साल जुड़ते रहते हैं और चार साल में मिलकर एक पूरा दिन बन जाते हैं। इसी अतिरिक्त दिन को समायोजित करने के लिए हर चार साल में लीप ईयर आता है, जिसमें फ़रवरी 28 की जगह 29 दिन की होती है।

लेकिन फ़रवरी ही क्यों?
यहाँ विज्ञान नहीं, बल्कि इतिहास अहम भूमिका निभाता है।
प्राचीन रोमन कैलेंडर में शुरुआत में केवल 10 महीने हुआ करते थे। बाद में जब 12 महीने जोड़े गए, तब फ़रवरी साल का आख़िरी महीना थी। रोमन संस्कृति में विषम संख्याओं को शुभ माना जाता था, इसलिए ज़्यादातर महीनों में 29 या 31 दिन रखे गए।
लेकिन साल को 365 दिनों के आसपास रखने के लिए किसी एक महीने से दिन घटाने ज़रूरी थे। उस समय फ़रवरी को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से कम शुभ माना जाता था, इसलिए दिन घटाने की “कुर्बानी” फ़रवरी को दी गई, और उसे 28 दिनों का महीना बना दिया गया।
परंपरा आज भी जारी
बाद में जूलियस सीज़र और फिर ग्रेगोरियन कैलेंडर में सुधार हुए, लेकिन फ़रवरी की दिन-संख्या को नहीं बदला गया। दुनिया उसी प्रणाली की आदी हो चुकी थी, इसलिए फ़रवरी आज भी साल का सबसे छोटा महीना बनी हुई है।
निष्कर्ष
फ़रवरी में सबसे कम दिन होना किसी प्राकृतिक नियम का नतीजा नहीं, बल्कि हज़ारों साल पुराने रोमन कैलेंडर, धार्मिक मान्यताओं और गणितीय समायोजन का परिणाम है।
