
1 उदक कुंड (अमृत कुंड)
केदारनाथ मंदिर से लगभग 100 मीटर की दूरी पर स्थित यह कुंड मंदिर के मुख्य आस्था पथ पर है। इसे अमृत कुंड भी कहा जाता है।
- महत्व और मान्यता:मान्यता है कि केदारनाथ में शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल सीधे इसी कुंड में आता है। श्रद्धालु इस कुंड का जल अपने साथ घर ले जाते हैं और इसे गोमूत्र के समान पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि मृत्यु के समय इसकी कुछ बूंदें मुख में डालने से व्यक्ति की आत्मा को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। इस कुंड का जल रोग और दोषों को दूर करने वाला भी माना जाता है। केदारनाथ में भगवान शिव की पंचमुखी उत्सव डोली को ओंकारेश्वर मंदिर ले जाते समय उदक कुंड के जल का छिड़काव किया जाता है।
- 2013 की आपदा और पुनर्निर्माण: 2013 की भीषण जल प्रलय में यह कुंड भी मलबे में दब गया था। पुनर्निर्माण कार्यों के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अन्य एजेंसियों द्वारा इसे इसके पुराने स्वरूप में लाने की कवायद की गई है और इसे पुनर्स्थापित किया गया है।
- रेतस कुंड यह कुंड भैरव पर्वत की ओर मंदिर से लगभग 300 मीटर की दूरी पर स्थित है।

महत्व और मान्यता: इस कुंड की सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि जब आप इसके पास “ओम नमः शिवाय” का उच्चारण करते हैं, तो पानी में बुलबुले उठने लगते हैं। यह भक्तों के लिए एक चमत्कारी अनुभव होता है। कहा जाता है कि इस कुंड का पानी पीने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पौराणिक कथा: रेतस कुंड के विषय में एक कथा प्रचलित है कि जब कामदेव को भगवान शिव ने भस्म कर दिया था, तब उनकी पत्नी देवी रति ने इसी स्थान पर विलाप करते हुए अश्रु बहाए थे। उन्हीं अश्रुओं से इस कुंड का निर्माण हुआ, जिससे इसका नाम ‘रेतस’ पड़ा।
- 2013 की आपदा और वर्तमान स्थिति: 2013 की आपदा में यह कुंड भी प्रभावित हुआ था, लेकिन पुनर्निर्माण के प्रयासों के बाद इसे भी पुनर्स्थापित किया गया है।
- हंस कुंड हंस कुंड, जिसे तर्पण कुंड भी कहा जाता है, केदारनाथ मंदिर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर सरस्वती नदी के पास स्थित है।
- महत्व और मान्यता: यह कुंड विशेष रूप से पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि यहां पर पिंडदान करने से वह सीधे पितरों को मिलता है और आत्मा को शांति व मुक्ति मिलती है। यहां अस्थि विसर्जन और मृत व्यक्ति की जन्मकुंडली विसर्जित करने का भी विधान है, जिससे जीवात्मा को मोक्ष मिलता है। इसी कारण केदारनाथ धाम को मोक्ष धाम भी कहा जाता है।
- पौराणिक कथा:
- केदारखंड में उल्लेख मिलता है कि इस स्थान पर ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण किया था, इसलिए इसे हंस कुंड कहा जाता है।
- 2013 की आपदा और पुनर्निर्माण: यह कुंड भी 2013 की आपदा में मलबे में दब गया था, लेकिन अब इसे भी जीर्णोद्धार करके पुनर्जीवित किया गया है।
इन कुंडों का केदारनाथ धाम की आध्यात्मिक यात्रा में एक विशेष स्थान है। ये न केवल पवित्र जल के स्रोत हैं, बल्कि इनसे जुड़ी कथाएं भक्तों की आस्था को और गहरा करती हैं। केदारनाथ की आरती में इनका उल्लेख धाम की समग्र पवित्रता और महिमा को दर्शाता है।

लेखक
उपेंद्र पंवार
