
जाख देवता मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के केदारघाटी में गुप्तकाशी से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित है। यह स्थानीय समुदायों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व रखता है।

जाख देवता मंदिर और परंपराओं के मुख्य पहलू:
- देवता: यह मंदिर जाख देवता को समर्पित है, जिन्हें रक्षक और समृद्धि प्रदान करने वाले के रूप में पूजा जाता है। कुछ किंवदंतियाँ उन्हें प्राचीन भारतीय ग्रंथों के यक्षों से जोड़ती हैं, और कुछ तो उन्हें महाभारत के अर्जुन के पुत्र बर्बरीक मानते हैं। उन्हें इस क्षेत्र में वर्षा का देवता भी माना जाता है।
- अनोखा मेला: हर साल, आमतौर पर हिंदू महीने वैशाख (अप्रैल/मई) के दूसरे दिन एक विशेष मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला आसपास के गांवों के लिए एक महत्वपूर्ण आयोजन है।
- अग्नि नृत्य: इस मेले की सबसे विशिष्ट परंपरा पश्वा (एक व्यक्ति जो trance में होता है और जिसे देवता का वाहन माना जाता है) द्वारा एक बड़े अग्निकुंड में जलते हुए अंगारों पर नृत्य करना है। माना जाता है कि यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से, संभवतः 11वीं शताब्दी से चली आ रही है। इसे क्षेत्र की भलाई और भविष्य की समृद्धि के लिए एक पवित्र अनुष्ठान माना जाता है, और यह भी माना जाता है कि यह सूखे से जूझ रहे क्षेत्रों में वर्षा लाता है।
- मेले की तैयारी: मेले से कई दिन पहले, नारायणकोटी और कोठेड़ा जैसे आसपास के गांवों के लोग जंगलों से लकड़ी, अक्सर चाँदी की ओक, इकट्ठा करते हैं ताकि मंदिर के पास एक विशाल अग्निकुंड बनाया जा सके। फिर मुख्य मेले के दिन से पूरी रात लकड़ी जलाई जाती है, जिससे गर्म अंगारों का बिस्तर बन जाता है।

- मेले के दौरान अनुष्ठान: मेले के दिन, जाख देवता का पश्वा, अक्सर अनुष्ठानिक स्नान के बाद, पारंपरिक संगीत के साथ अग्निकुंड पर पहुँचता है। माना जाता है कि देवता पश्वा पर उतरते हैं, जो तब निडर होकर जलते हुए कोयलों पर चलता और नृत्य करता है। इसके बाद, पश्वा को ठंडे पानी से स्नान कराया जाता है और फिर भक्तों को फूलों से आशीर्वाद दिया जाता है। अग्निकुंड की राख को पवित्र माना जाता है और भक्त इसे प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं।
- मंदिर का महत्व: जाख देवता मंदिर स्थानीय लोगों के लिए आस्था का केंद्र है, जो प्राकृतिक आपदाओं से उनकी रक्षा करने और सौभाग्य लाने की देवता की शक्ति में विश्वास करते हैं। मेले के दौरान, हजारों भक्त अद्वितीय अग्नि नृत्य देखने और आशीर्वाद लेने के लिए इकट्ठा होते हैं।
- इतिहास: मंदिर का इतिहास काफी पुराना माना जाता है, कुछ स्रोतों के अनुसार इसकी उपस्थिति 11वीं शताब्दी (संवत 1111) से है। मंदिर की देखभाल और परंपराओं को आसपास के चौदह गांवों के लोग बनाए रखते हैं।
