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हरीश राणा: 11 साल का वो ‘इंतज़ार’, जिसने पत्थरों को भी रुला दिया -
हरीश राणा: 11 साल का वो ‘इंतज़ार’, जिसने पत्थरों को भी रुला दिया
गाजियाबाद के एक साधारण से घर में साल 2013 की उस काली शाम ने सब कुछ बदल दिया था। चौथी मंजिल से गिरे 19 साल के जवान बेटे हरीश राणा की चीखें शायद शांत हो गई थीं, लेकिन उसके माता-पिता की रूह पर जो घाव लगे, वे आज भी ताज़ा हैं।

पिछले 11-13 सालों से हरीश न तो कुछ बोल सका, न सुन सका और न ही अपनी आँखों से दुनिया देख सका। वह ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में था—यानी शरीर तो जीवित था, लेकिन आत्मा और दिमाग कहीं गहरी खामोशी में कैद थे। वह बस एक बिस्तर पर पड़ा ‘ज़िंदा बुत’ बनकर रह गया था। उसकी सेवा करते-करते बूढ़े माता-पिता की कमर झुक गई, लेकिन उनकी उम्मीदें कभी नहीं टूटीं… जब तक कि डॉक्टरों ने यह नहीं कह दिया कि ‘अब चमत्कार भी रास्ता बदल चुका है’।
ममता की वो बेबसी: जब माँ ने माँगी बेटे के लिए ‘मौत’
सोचिए उस माँ-बाप के दिल पर क्या गुजरी होगी, जिन्होंने कभी बेटे के सिर पर सेहरा सजाने के सपने देखे थे, आज वही उसकी ‘शांतिपूर्ण विदाई’ के लिए हाथ जोड़ रहे थे। हरीश के माता-पिता ने जब अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो उनकी आँखों में आंसू और दिल में एक ही बोझ था—“हम तो बूढ़े हो चले हैं, हमारे जाने के बाद हमारे इस बेजान बेटे का क्या होगा? इसे इस नरक जैसी पीड़ा से मुक्ति दिला दो।”
कानून की चौखट पर ‘सम्मान’ की गुहार
यह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं थी, यह एक इंसान के ‘सम्मान के साथ मरने’ (Dignity in Death) की गुहार थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस दर्दभरी पुकार को सुना। कोर्ट ने माना कि किसी को मशीनों के सहारे केवल इसलिए ज़िंदा रखना कि वह सांस ले रहा है, उसके साथ क्रूरता है।
ऐतिहासिक फैसला: जब न्याय ने दी ‘शांति’
मार्च 2026 में जब जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हरीश को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) की अनुमति दी, तो मानो न्याय के मंदिर ने उस थके हुए शरीर को आज़ाद कर दिया। कोर्ट ने AIIMS को निर्देश दिया कि हरीश को ऐसी देखभाल (Palliative Care) दी जाए जिससे उसे दर्द न हो और धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटा लिया जाए।

आगे की जानकारी के लिए ये मुख्य बातें जोड़ें:
  • लिविंग विल (Living Will): न्यूज़ में यह ज़रूर बताएँ कि अब सरकार ने नियम आसान कर दिए हैं। कोई भी स्वस्थ व्यक्ति अब पहले से लिख सकता है कि ऐसी स्थिति आने पर उसे मशीनों पर न रखा जाए।
  • प्रक्रिया: इसे लागू करने के लिए अब केवल एक नोटरी या राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) के हस्ताक्षर ही काफी हैं, पहले जिला मजिस्ट्रेट के चक्कर काटने पड़ते थे।
  • मेडिकल बोर्ड की भूमिका: अब दो मेडिकल बोर्ड (प्राइमरी और सेकेंडरी) बहुत कम समय में यह फैसला ले सकते हैं कि मरीज को और कष्ट देना सही है या नहीं।
इच्छामृत्यु क्या है? (What is Euthanasia?)
सरल शब्दों में, जब कोई व्यक्ति ऐसी बीमारी से जूझ रहा हो जिसका कोई इलाज न हो और उसका दर्द असहनीय हो जाए, तो उसे ‘सम्मान के साथ मौत’ देने की प्रक्रिया को इच्छामृत्यु कहते हैं। इसे “मर्सी किलिंग” (Mercy Killing) भी कहा जाता है।
भारत में इसके दो मुख्य कानूनी पहलू हैं:
1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) – भारत में अवैध
इसमें डॉक्टर मरीज की जान लेने के लिए सक्रिय कदम उठाते हैं, जैसे कि ज़हरीला इंजेक्शन देना।
  • स्थिति: भारत में यह पूरी तरह से गैरकानूनी है और इसे ‘हत्या’ माना जाता है।
2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) – भारत में कानूनी
इसमें मरीज को ‘मारने’ के बजाय, उसे ‘ज़िंदा रखने वाले सपोर्ट’ को हटा लिया जाता है। जैसे:
  • वेंटिलेटर बंद कर देना।
  • फीडिंग ट्यूब (खाना देने वाली नली) निकाल लेना।
  • ऐसी दवाएं बंद कर देना जो केवल उसकी धड़कनें चला रही थीं।
  • स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे कानूनी मान्यता दी थी, ताकि मरीज को प्राकृतिक मौत मिल सके।

इच्छामृत्यु के लिए आवेदन कैसे करें? (The Process)
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को बहुत सरल बना दिया है। इसके दो तरीके हैं:
A. लिविंग विल (Living Will/Advance Directive)
अगर आप स्वस्थ हैं, तो आप पहले से एक वसीयत लिख सकते हैं।
  • लिखें: इसमें साफ लिखें कि यदि भविष्य में आप ऐसी स्थिति (जैसे कोमा) में पहुँच जाएँ जहाँ ठीक होना नामुमकिन हो, तो आपको लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए।
  • सत्यापन: इस पर दो गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए और इसे नोटरी या राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) से अटेस्ट कराना होता है।
  • फायदा: आपके कोमा में जाने पर परिवार को कोर्ट के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
B. जब ‘लिविंग विल’ न हो (जैसा हरीश राणा केस में हुआ)
अगर मरीज ने पहले से कुछ नहीं लिखा है, तो प्रक्रिया यह होती है:
  1. अस्पताल का बोर्ड: अस्पताल के डॉक्टरों का एक बोर्ड (Primary Medical Board) मरीज की जांच करता है और रिपोर्ट देता है कि वह कभी ठीक नहीं होगा।
  2. ज़िला बोर्ड: इसके बाद ज़िला मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) एक दूसरा बोर्ड (Secondary Board) बनाते हैं जो पहले बोर्ड की रिपोर्ट को चेक करता है।
  3. अंतिम सहमति: अगर दोनों बोर्ड सहमत हैं और परिवार भी लिखित सहमति देता है, तो लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है।


“हरीश राणा का केस हमें सिखाता है कि कभी-कभी किसी से प्यार करने का मतलब उसे थामे रखना नहीं, बल्कि उसे शांति से जाने देना भी होता है। भारत के कानून ने आज एक बेटे की पीड़ा और उसके माता-पिता की बेबसी को एक सम्मानजनक अंत दिया है।” upendra panwar 

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