उत्तराखण्ड का पहला गौरवशाली राजवंश: जानिए महाभारत काल से जुड़े ‘कुणिन्द वंश’ का इतिहास, शौर्य और पतन की पूरी कहानी
देहरादून (डिजिटल डेस्क)। उत्तराखण्ड की पावन धरती का इतिहास जितना आध्यात्मिक है, उत
ना ही यह राजनैतिक शौर्य से भी भरा हुआ है। आज हम बात कर रहे हैं मध्य हिमालयी क्षेत्र (आधुनिक उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश) पर शासन करने वाली पहली राजनैतिक शक्ति— ‘कुणिन्द राजवंश’ (या कुलिन्द वंश) की। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी तक राज करने वाले इस वंश का इतिहास आज भी उत्तराखण्ड के कण-कण में जीवंत है।

हालिया ऐतिहासिक शोधों और पुरातत्वविदों की रिपोर्ट के अनुसार, कुणिन्दों का शासनकाल न केवल राजनैतिक रूप से मजबूत था, बल्कि यह आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भी उत्तराखण्ड का ‘स्वर्ण काल’ माना जाता है। आइए जानते हैं इस राजवंश से जुड़ी कुछ बेहद खास और अनसुनी बातें:
- महाभारत युद्ध से जुड़े हैं तार, पाणिनि ने कहा था ‘योद्धाओं का संघ’
कुणिन्द राजवंश का उल्लेख प्राचीन धार्मिक और साहित्यिक ग्रंथों में प्रमुखता से मिलता है। महाभारत के सभा पर्व और आरण्यक पर्व में इस वंश के राजा सुबाहु का जिक्र है, जिनकी राजधानी ‘सुबाहुपुर’ (वर्तमान श्रीनगर, गढ़वाल) थी। राजा सुबाहु ने महाभारत के युद्ध में पाण्डवों का साथ दिया था। वहीं, महान व्याकरणचार्य पाणिनि ने अपनी पुस्तक ‘अष्टाध्यायी’ में कुणिन्दों को ‘आयुधजीवी संघ‘ कहा है, जिसका अर्थ है— एक ऐसा समाज जो पूरी तरह अपनी युद्ध कला और शौर्य पर निर्भर था।
- सम्राट अशोक की धमक और बौद्ध धर्म का प्रसार
इतिहासकारों के अनुसार, 257 ईसा पूर्व में जब मौर्य सम्राट अशोक ने देहरादून के पास कालसी में अपना शिलालेख स्थापित किया, तब यह क्षेत्र कुणिन्दों के ही अधीन था। इस घटना के बाद मध्य हिमालयी क्षेत्र में बौद्ध धर्म का तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ। कुणिन्द राजाओं ने मौर्यों की संप्रभुता को स्वीकार करते हुए अपने क्षेत्रों में कला और शांति को बढ़ावा दिया।
- राजा अमोघभूति: वो प्रतापी राजा जिसने जारी किए द्विभाषी सिक्के
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में इस वंश में राजा अमोघभूति का उदय हुआ, जो कुणिन्द वंश के सबसे शक्तिशाली और पराक्रमी शासक बने। उन्होंने मैदानी इलाकों तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
व्यापार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के लिए अमोघभूति ने चांदी और तांबे के विशेष सिक्के जारी किए। इन सिक्कों की खास बात यह थी कि इन पर ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियों का प्रयोग किया गया था और इन पर लक्ष्मी व हिरण के चित्र अंकित थे।
- विदेशी शकों का आक्रमण और ‘महागठबंधन‘ से कुषाणों की करारी हार
राजा अमोघभूति की मृत्यु के बाद कुणिन्द साम्राज्य थोड़ा कमजोर पड़ा, जिसका फायदा उठाकर विदेशी शकों (Scythians) ने इनके मैदानी भागों पर कब्ज़ा कर लिया। कुणिन्द केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सिमट कर रह गए।
लेकिन इस वंश का सबसे गौरवशाली क्षण तब आया जब शक्तिशाली कुषाण राजवंश ने पहाड़ों पर चढ़ाई करने की कोशिश की। कुणिन्दों ने पड़ोसी ‘याधैय’ और ‘अर्जुनयन’ गणराज्यों के साथ मिलकर एक ऐतिहासिक सैन्य गठबंधन बनाया। इस संयुक्त सेना ने कुषाणों को युद्ध के मैदान में धूल चटा दी और मध्य हिमालय से खदेड़ दिया।
- जब भगवान शिव को घोषित कर दिया ‘साम्राज्य का राजा‘
शासनकाल के अंतिम दौर (तीसरी शताब्दी ईस्वी) में यहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हुआ और शैव मत (भगवान शिव की पूजा) का पुनरुत्थान हुआ। इस दौरान कुणिन्दों ने ‘छत्रेश्वर (चत्रेश्वर) प्रकार‘ के सिक्के जारी किए। इन सिक्कों पर हाथ में त्रिशूल लिए भगवान शिव का चित्र था। राजाओं ने स्वयं को शासक न मानकर, भगवान शिव को ही अपने साम्राज्य का वास्तविक राजा घोषित कर दिया था।
कैसे हुआ इस महान वंश का अंत?
चौथी शताब्दी ईस्वी के आते-आते भारत में गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ। इतिहासकार बताते हैं कि गुप्त वंश के महान सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने राष्ट्र-विस्तार अभियान (प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार) के तहत कुणिन्दों के क्षेत्र (कर्तपुर राज्य) को अपने अधीन कर लिया। इसके साथ ही उत्तराखण्ड की इस पहली राजनैतिक शक्ति का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया, लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत और सिक्कों के रूप में वे आज भी अमर हैं।
