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उत्तराखंड की संस्कृति में ‘रोटना और अरसा’ -
उत्तराखंड की संस्कृति में ‘रोटना और अरसा’ केवल पकवान नहीं, बल्कि खुशियों और परंपराओं के प्रतीक हैं।
1. अरसा (Arsa) – “पहाड़ों का राजकीय मीठा”
अरसा उत्तराखंड की सबसे लोकप्रिय पारंपरिक मिठाई है, जिसके बिना हर शुभ कार्य अधूरा माना जाता है।
  • इतिहास: माना जाता है कि इसका इतिहास 1100 साल से भी अधिक पुराना है। 9वीं शताब्दी में जब आदि गुरु शंकराचार्य दक्षिण भारत से आए थे, तब उनके साथ आए ब्राह्मणों ने ‘अर्शालु’ नामक मिठाई का परिचय दिया, जो कालांतर में यहाँ ‘अरसा’ बन गई।
  • मुख्य सामग्री: इसे भीगे हुए चावल, गुड़ और सरसों के तेल या घी से बनाया जाता है।
  • सांस्कृतिक महत्व: उत्तराखंड में शादी के बाद जब बेटी पहली बार ससुराल जाती है, तो उसे टोकरी भर कर (‘कंडी’ में) अरसा उपहार स्वरूप दिया जाता है। इसे ‘कलेऊ’ परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
2. रोटना ( Rotana) – “देवताओं का भोग”
रोत को अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों और त्योहारों पर बनाया जाता है
  • बनावट और स्वाद: यह गेहूं के आटे, गुड़, घी, सौंफ और इलायची से तैयार किया जाने वाला एक मोटा और मीठा पकवान है। इसे लोहे के तवे पर धीमी आंच पर सेंका जाता है。
  • धार्मिक जुड़ाव: गढ़वाल क्षेत्र में भगवान बद्रीनाथ और हनुमान जी को रोत का भोग लगाया जाता है। इसे अक्सर प्रसाद के रूप में भी वितरित किया जाता है。
  • लंबी शेल्फ-लाइफ: इसकी खासियत यह है कि यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, इसलिए पहाड़ी लोग यात्रा के दौरान इसे साथ रखना पसंद करते हैं
  1. व्यवसाय और स्वरोजगार: टिहरी गढ़वाल का आगराखाल क्षेत्र अरसा और रोटना के व्यावसायिक उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हो गया है, जहाँ के उत्पादों की मांग अब विदेशों तक है。
  2. विलुप्त होती परंपरा: पुरानी तकनीक (जैसे ओखली में चावल कूटना) की जगह अब मशीनों ने ले ली है। आप इस पर रिपोर्ट कर सकते हैं कि कैसे आधुनिकता में भी लोग अपने पारंपरिक स्वाद को बचाए हुए हैं。
  3. सेहत और शुद्धता: चीनी के बजाय गुड़ का उपयोग होने के कारण इसे आज के दौर में एक स्वस्थ मिठाई के विकल्प के रूप में पेश किया जा सकता है आगराखाल यह रोत और अरसे का सबसे बड़ा हब माना जाता है. कोटद्वार का डोब्रियाल आर्ष सेंटरस्थानीय स्तर पर काफी प्रसिद्ध है.

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